कुंड पर फैली पूजन सामग्रियां, मरने लगीं मछलियां
पिशाचमोचन कुंड पर श्राद्धकर्म के बाद पूजन सामग्री फैली हुई थी। उठान न होने से जगह जगह डंप भी पड़ा है। इसके चलते श्राद्धकर्म करवाने वालों को दिक्कत हो रही है। वहीं, कुंड में सामग्री डाले जाने से पानी भी गंदा हो रहा है। इसके चलते कुंड की मछलियां मरने लगी हैं।
चार तरह के श्राद्धकर्म, 61 तरह की सामग्रियों से हो रहा तर्पण
पितृपक्ष में लोग पितृदोष से मुक्ति के लिए पिशाचमोचन कुंड पर श्राद्धकर्म कर पितरों को तृप्तकर सुख-समृद्धि की कामना कर रहे हैं। चार तरह के श्राद्धकर्म के लिए 40 से 61 तरह की सामग्रियों की जरूरत पड़ती है। इसे जुटाने में छह माह लग जाते हैं। इसमें त्रिदेवों की सोने, चांदी और तांबे की मूर्ति के अलावा तीन तरह की औषधियां, छह तरह के फूल और पत्तियां, चार तरह के पल्लव आदि होते हैं।
पितृदोष से मुक्ति के लिए चार तरह के श्राद्धकर्म होते हैं। इसमें त्रिपिंडी, नारायण बलि, पार्वण और तीर्थ श्राद्ध हैंं। कर्मकांडी ब्राह्मण पं. कुलवंत मणि त्रिपाठी ने बताया कि त्रिपिंडी श्राद्ध में 40 सामग्री, नारायण बलि में 61, पार्वण श्राद्ध में 35 से 40 और तीर्थ श्राद्ध में 20 सामग्री की जरूरत पड़ती है।
श्राद्धकर्म में त्रिदेवों और सोने की नाग की मूर्तियों के अलावा धातु का लोटा, नारियल, चार तरह के कपड़े, तीन तरह का झंडा, 16 पीस जनेऊ, 16 सोपाड़ी, नारा, पीला सरसों, रोरी, चंदन, घी, बुका, कपूर, लौंग, इलायची, दूध, शहद, पंचरत्न, सर्व औषधि, गुलाब जल, केवड़ा, इत्र, केला, मिठाई, नींबू, मुसम्मी, अदरक, कूसा, पान का पत्ता, तील, चावल, जौ, जूता, छाता, अपराजिता, मदार, दौना का फूल, बेलपत्र, तुलसी, दुर्वा, लोटा, कसोरा, दीया, कलश, पत्तल आदि सामग्रियां शामिल होती हैं।
छह दिन में दो लाख लोगों ने किया श्राद्धकर्म
पितृपक्ष पर काशी में श्राद्धकर्म के लिए रोज ही 15 से 20 हजार लोग पहुंच रहे हैं। पिशाचमोचन कुंड, गंगाघाटों और गलियों में छह दिनों में दो लाख से अधिक लोगों ने अपने पितरों की आत्मा की तृप्ति के लिए पिंडदान व श्राद्धकर्म किया। पिशाचमोचन कुंड के तीर्थ पुरोहित पं. आनंद पांडेय व पं. अनिल उपाध्याय ने बताया कि तिथियों पर 30 से 40 हजार और सामान्य दिनों में 10 से 15 हजार लोग श्राद्ध व पिंडदान करवा रहे हैं।