लखनऊ के दो घाटों पर शुरूआत
गोरखपुर की संस्था ने कुछ दिनों पूर्व ही लखनऊ के बैकुंठ व गुलाला घाट पर लकड़ी आधारित अंत्येष्टि गृह की शुरूआत की है। वहीं गोरखपुर के बड़हलगंज मुक्ति धाम व कुशीनगर के रामकोला में इसकी शुरूआत की गई है।
तीन मन लकड़ी में हो जाएगी अंत्येष्टि, कम होगा प्रदूषण
लकड़ी आधारित शवदाहगृह में शव को एक ट्राली में रखा जाएगा, जहां उसमें लगी भट्टी शव को राख में तब्दील कर देगी। बाद में वहां बने प्लेटफॉर्म को खिसकाया जाएगा जहां से राख नीचे गिर जाएगी। उनका कहना है कि इस मशीन को लगाने में 54 लाख का खर्च आता है। लकड़ी आधारित शवदाह गृह का निर्माण करने वाली संस्था ऊर्जा गैसीफायर प्राइवेट लिमिटेड के प्रोपराइटर अजय कुमार जायसवाल का कहना है कि ढाई से तीन मन लकड़ी में डेढ से दो घंटे में विधिवत ढंग से अंत्येष्टि हो जाएगी। इससे जहां लकड़ी की बचत होगी वहीं परंपराओं का भी निर्वहन होगा। खास बात यह होगी कि वायुमंडल में प्रदूषण कम होगा।
मोक्ष के लिए आते हैं काशी
सतुआ बाबा आश्रम के महामंडलेश्वर संतोष दास ने बताया कि पुराणों में वर्णित है कि काशी में मरने या अंतिम संस्कार होने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि बनारस ही नहीं पूर्वांचल समेत आसपास केप्रदेशों से लोग अंतिम संस्कार के लिए आते हैं।
हरिश्चंद्र घाट पर 1988 में शुरू हुआ शवदाह गृह
हरिश्चंद्र घाट पर विद्युत शवदाह गृह की शुरूआत 1988 में नगर निगम ने की थी। बाद में इसे अपग्रेड करते हुए गेल ने 2018 इसे प्राकृतिक गैस शवदाह के रूप में विकसित किया।