श्री काशी विश्वनाथ धाम यात्रा के तहत आयोजित राग रंग महोत्सव में देश भर के संगीत घरानों की सुर सरिता प्रवाहमान हुई। पद्मविभूषण गिरिजा देवी सांस्कृतिक संकुल में शास्त्रीय संगीत घरानों के समागम की अंतिम निशा सुर, लय, ताल की संगीत यात्रा का साक्षी बना। नीलाद्री का सितार, पद्मश्री राशिद खान की गायकी, राजेंद्र प्रसन्ना की शहनाई और विदुषी कलारामनाथ के वायलिन ने संगीत का मनमोहक माहौल रच दिया।
शुक्रवार की शाम को राग रंग महोत्सव का शुभारंभ वायलिन वादक विदुषी कलारामनाथ और शहनाई वादक पं राजेंद्र प्रसन्ना की युगलबंदी से हुआ। राग मधुवंती से उन्होंने शुरूआत की। तबले पर पं. मिथिलेश झा, दुक्कड़ पर मंगल प्रसाद व शहनाई पर विकास बाबू ने संगत की। इसके बाद रामपुर सहसवान घराने के ख्यात गायक पद्मश्री राशिद खान ने राग पूरिया धनश्री में विलंबित एक ताल और छोटा ख्याल में पायलिया झनकार मोरी की प्रस्तुति दी। समापन उन्होंने राग यमन में भजन से किया। तबले पर पं. रामकुमार मिश्र, सारंगी पर मुराद अली खान, हारमोनियम पर डॉ. विनय मिश्रा तथा सहगायन में अरमान खां ने संगत की। समारोह की अंतिम प्रस्तुति में सितारवादक पं. नीलाद्री कुमार ने स्वरलहरियों की तान से श्रोताओं को झूमा दिया।
उन्होंने राग तिलक कामोद में मसीदखानी गत का वादन किया। इसके बाद राग नटतिलक में बंदिश और समापन राग भैरवी की धुन से किया। तबले पर सत्यजीत तलवरकर ने संगत की। अतिथियों का स्वागत पद्मश्री डॉ. राजेश्वर आचार्य, संयोजन डॉ. सुभाष चंद्र यादव, तरुण राज और संचालन सौरभ चक्रवर्ती ने किया। समारोह का आयोजन संगीत नाटक अकादमी नई दिल्ली, उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी लखनऊ, धर्मार्थ कार्य विभाग, संस्कृति विभाग उत्तर प्रदेश सरकार एवं जिला प्रशासन वाराणसी के संयुक्त तत्वावधान में किया गया। इस दौरान महंत प्रो. विश्वंभरनाथ मिश्र, डॉ. लवकुश द्विवेदी, अखिलेश यादव, प्रशांत, अभिषेक राय, अंगिका मिश्रा, श्रुति प्रकाश, अतुल कुमार, शिवम मौजूद रहे।