चलतु रामु लखि अवध अनाथ, बिकल लोग सब लागे साथा, कृपासिंधु बहुविधि समुझावहिं, फिरहि प्रेेम बस पुनि फिरि आवहिं...। श्री रामचंद्र को जाते और अयोध्या को अनाथ देखकर सब लोग व्याकुल होकर उनके साथ हो लिए। कृपा के समुद्र प्रभु राम उनको समझाते हैं तो वह अयोध्या लौट जाते हैं लेकिन प्रेमवश फिर राम के पास लौट आते हैं।
शनिवार को लोहटिया स्थित अयोध्या भवन में चित्रकूट रामलीला में राम वनगमन की झांकी सजाई गई। राजा दशरथ राम के वनगमन से मूर्छित हो जाते हैं। जब उनकी मूर्छा दूर होती है तो वह सुमंत को बुलाकर कहते है कि श्रीराम वन को चले गए, पर मेरे प्राण नहीं जा रहे हैं। ना जाने यह किस सुख के लिए मेरे शरीर में अटके हुए हैं। इससे अधिक भारी कौन सी व्यथा होगी जिससे मेरे प्राण शरीर को त्याग देंगे। वह सुमंत को आदेश देते हैं कि वह राम के साथ जाएं। भगवान राम के वनगमन लीला का प्रसंग लीला प्रेमियों की आंखों को सजल कर गया। भगवान के वनगमन के लीला की झांकी देखकर मौजूद हर श्रद्धालु की आंखों की कोरें गीली हो गईं। तुलसी प्रसाद और स्वरूपों की आरती के साथ लीला को विराम दिया गया। इस दौरान सुबोध अग्रवाल, मोहन कृष्ण अग्रवाल, मुकुंद उपाध्याय, सत्येंद्र कुमार राय आदि मौजूद रहे।