दुर्गाकुंड स्थित कूष्मांडा मंदिर में भव्य सजावट
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मां को मुखौटा और स्वर्ण से श्रृंगार हुआ। बेला, गुड़हल आदि सुगंधित फूलों से मोहक झांकी सजी। पांच तरह के फल व पांच तरह की मिठाई का भोग लगा। दोपहर में मां का गजरा से श्रृंगार हुआ। शयन आरती के बाद मंदिर का पट बंद हुआ। महंत ने बताया कि यहां मां के दर्शन के अलावा साधक तंत्र साधना भी करते हैं।
नवरात्र में यंत्र रूप में पूजी जाती हैं मां कूष्मांडा
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माता कूष्मांडा में ब्रह्मांड को उत्पन्न करने की शक्ति व्याप्त है और वे उदर से अंड तक अपने भीतर ब्रह्मांड को समेटे हुए हैं, इसलिए मातारानी को कूष्मांडा नाम से जाना जाता है। इसको कवचरूप में धारण करने से यमराज का भी भय नहीं हो सकता। भूत, प्रेत, पिशाच, शाकिनी, डाकिनी आदि का भी भय नहीं होगा। राक्षस, क्रूरगण, विषधर सर्प, अग्नि, चोर, वेताल, कंकाल, ग्रहगण, बालग्रह से भी रक्षा होती है।
काशी महात्म्य में वर्णित है कि शिव नगरी काशीपुरी के आठों दिशाओं की अधिष्ठात्री नव शक्तियां हैं। वे भी क्रम से इस अविमुक्त क्षेत्र में सहस्रों-उपद्रवों से रक्षा करती हैं। उनमें एक हैं मां कूष्मांडा देवी। यह काशीपुरी के दुर्गाकुंड के तट पर ''यंत्ररूप'' में पूजित होती हैं जो दुर्गा देवी नाम से प्रसिद्ध हैं।