प्रभावशाली पिछड़ी जातियों में गिने जाने वाले पटेल और कुर्मी बिरादरी की पार्टी के तौर पर स्थापित अपना दल (एस) और उनकी नेता अनुप्रिया पटेल (Anupriya patel) के साथ न रहने पर भाजपा को एक दर्जन सीटों पर कड़ी चुनौती का ही सामना नहीं करना पड़ता, छवि भी पिछड़ा विरोधी हो जाती।
भाजपा ने इसीलिए पांच निगमों में अपना दल (एस) के नेताओं को समायोजित करने का आश्वासन दिया है। पार्टी मानती है कि कांग्रेस-अपना दल (एस) का गठबंधन होने पर पूर्वांचल की कुछ सीटों पर सपा-बसपा गठबंधन अंदर खाने इनकी मदद कर सकता था।
वहीं, अपना दल (एस) के राष्ट्रीय अध्यक्ष आशीष सिंह पटेल का कहना है कि मौजूदा माहौल में देश हित सर्वोपरि है। एनडीए और भाजपा को समर्थन जरूरी है। इसीलिए हमने शाह से मुलाकात से पहले ही 28 को लखनऊ में होने वाली बैठक रद्द कर दी।
अपना दल (एस) के साथ गठबंधन आगे बढ़ाकर भाजपा ने सुभासपा के अकेले चुनाव मैदान में उतरने के रास्ते भी बंद कर दिए हैं। पार्टी अध्यक्ष और कैबिनेट मंत्री ओमप्रकाश राजभर पिछड़ों के आरक्षण में बंटवारे को मुद्दा बना चुके हैं। इस बारे में 19 को शाह से उनकी बातचीत हुई थी। शाह ने कहा है कि चुनाव के बाद ही इसे लागू किया जा सकता है। शाह से अगले दौर की बातचीत के लिए मंगलवार को उन्हें दिल्ली बुलाया गया था लेकिन नहीं हो पाई। अब राजभर और शाह की मुलाकात तीन मार्च के बाद हो सकती है।
अब सबकी नजर अमित शाह से ओमप्रकाश राजभर की मुलाकात पर है, जिसके बाद सूबे के सियासी परिदृश्य में थोड़ा बदलाव दिख सकता है। वहीं, अमित शाह(Amit shah) से मुलाकात के पहले सुभासपा अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर(Om Prakash rajbhar) ने अपना ‘मांग पत्र’ तैयार कर लिया है। जानकारी के मुताबिक सुभासपा दो सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए अड़ी है।
सूत्रों का कहना है कि सपा-बसपा गठबंधन के बाद प्रदेश के मतदाताओं की सोच पाकिस्तान पर एयर स्ट्राइक के बाद फिर बदल गई है। अब सुभासपा भाजपा पर ‘सीमित दबाव’ ही डाल पाएगी। ऊपर से अब अपना दल (एस) से भाजपा को समर्थन इस सियासी खेल में नया मोड़ ला सकता है।