नागरी प्रचारिणी सभा ने स्थापना के साथ ही प्राचीन विद्वानों के हस्तलेख नगरों और देहातों में से एकत्र कराना शुरू किया। 1900 से सभा ने अन्वेषकों को गांव-गांव और नगर-नगर में घर-घर भेजकर इस बात का पता लगाना आरंभ किया कि किसके यहां कौन-कौन से ग्रंथ उपलब्ध हैं।
उत्तर प्रदेश के अलावा पंजाब, दिल्ली, राजस्थान और मध्यप्रदेश में भी यह कार्य हुआ। इस खोज की त्रिवार्षिक रिपोर्ट भी सभा प्रकाशित करती है। हस्तलिखित ग्रंथों की खोज का संक्षिप्त विवरण भी चार भागों में सभा ने प्रकाशित किया है। परिणामस्वरूप ही हिंदी साहित्य का व्यवस्थित इतिहास तैयार हो सका और अनेक अज्ञात व ज्ञात लेखकों की अनेक अज्ञात कृतियां प्रकाश में आई हैं।
19 विषय हैं शामिल
दुर्लभ हस्तग्रंथों में 19 विषयों को शामिल किया गया है। इसमें अध्यात्म, दर्शन, योग, आयुर्वेद, इतिहास, कर्मकांड, कामशास्त्र, गणित, गीता, ज्योतिष, तंत्र-मंत्र, धर्म, नीति, भूगोल, शकुन, शालिहोत्र, सामुद्रिकशास्त्र, साहित्य, स्तोत्र, स्वरोदय विषयों के हस्तलेख हैं।