संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से बौद्ध दर्शन पर शोध करने वाले विद्यार्थियों के लिए ज्ञान के नए आयाम खुलेंगे। अब वे अधिक से अधिक बौद्ध स्तूपों के ऐतिहासिक महत्व के बारे में जानकारी हासिल कर सकेंगे। संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से अब बौद्ध धर्म दर्शन में म्यांमार के बौद्ध स्तूपों की महत्ता और उनकी ऐतिहासिकता पर शोध कराया जाएगा। म्यांमार के बगान में 40 किलोमीटर के दायरे में एक लाख से अधिक छोटे-बड़े बौद्ध स्तूप हैं। विश्वविद्यालय में अब तक सारनाथ, सांची, लुंबिनी आदि जगहों के बौद्ध स्तूपों पर ही शोध कराया जाता था।
बौद्ध संस्कृति भारत से ही निकलकर पूरी दुनिया में फैली। बावजूद इसके लोगों को बौद्ध स्तूपों के इतिहास, संरचना, महत्व और बौद्ध धर्म दर्शन के बारे में जिज्ञासा के बावजूद समुचित जानकारी नहीं मिल पाती। शोध का दायरा बढ़ने से छात्रों के साथ ही आम लोग भी बौद्ध धर्म दर्शन और उसकी इतिहास के बारे में जान सकेंगे। संस्कृत विश्वविद्यालय में फिलहाल म्यांमार के तीस से अधिक छात्र हैं, जिनमें पांच छात्र बौद्ध दर्शन विभाग के आचार्य प्रो. रमेश कुमार द्विवेदी के निर्देशन में शोध कर रहे हैं। प्रो. द्विवेदी ने बताया कि शोध के जरिए स्तूपों से जुड़े ऐतिहासिक तथ्यों को दुनिया के सामने लाने का प्रयास है। आम लोग इस बारे में जान सकें, इसके लिए कार्यशालाएं भी आयोजित कराई जाएंगी।
म्यांमार के बगान में करीब 40 किलोमीटर के दायरे में एक लाख से अधिक बौद्ध स्तूप हैं। अपने 12 दिन के म्यांमार प्रवास के दौरान हमने उन स्तूपों के बारे में पूरी जानकारी हासिल की। म्यांमार के स्तूपों पर शोध से उनके पुरातात्विक महत्वों को नए संदर्भों में जाना जा सकेगा।
- प्रो.रमेश कुमार द्विवेदी, बौद्ध दर्शन विभाग, संविवि
म्यांमार के बौद्ध स्तूपों पर शोध की पहल सराहनीय है। इससे छात्रों को स्तूपों के बारे में नई जानकारी हासिल होगी। बौद्ध संस्कृति की मूल जड़ भारत में ही रही है। न केवल म्यांमार बल्कि अन्य देशों में बने स्तूपों के बारे में भी जानकारी हासिल करनी चाहिए। - भिक्षु पी शिबली थेरो, संयुक्त सचिव, महाबोधि सोसाइटी ऑफ इंडिया