समाजवादी पार्टी के शिर्ष नेतृत्व में जारी 'महादंगल' के बीच अगर कोई सबसे ज्यादा दुविधा में है तो वो हैं मुख्तार अंसारी।
पिछले 20 वर्षों से मऊ की राजनीति में अपनी पहचान बना चुके मुख्तार अंसारी को इन दिनों दुविधा की राजनीति का सामना कर रहे हैं।
उनकी पार्टी कौमी एकता दल के सपा में विलय के बाद यह भी अभी तक साफ नहीं हो पाया है कि वह चुनाव लड़ेंगे भी कि नहीं।
उनकी पार्टी की गतिविधियां भी बंद है।
ऐसे में समाजवादी पार्टी से पहले से ही घोषित अल्ताफ अंसारी का सदर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ना तय है लेकिन शिवपाल गुट से वह लड़ेंगे या निर्दलीय लड़ेंगे इसे लेकर अभी सिर्फ कयास ही लगाए जा रहे हैं।
वह मऊ के सदर विधानसभा से 1996 में पहली बार बसपा से चुनाव जीतकर विधानसभा तक का सफर तय किया फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा।
कई बार जब हालांकि बाद में उन्हें किसी राजनीतिक पार्टियों ने टिकट नहीं दिया फिर भी वह निर्दलीय के रूप में विधायक चुने जाते रहे।
बाद में उन्हें अप्रत्यक्ष रूप से सपा का भी साथ मिला। लेकिन प्रदेश की राजनीति में अखिलेश यादव के वर्चस्व के बाद स्थिति कुछ बदली।
वर्ष 2012 के चुनावों में मुख्तार अंसारी की पार्टी कौमी एकता दल को सपा से करारी हार मिली।
तब मुख्तार अंसारी ने सदर विधानसभा की सीट सहित अपनी राजनीतिक पहचान बचाने के लिए सपा में विलय को लेकर शिवपाल यादव का दामन थामा। मुख्तार अंसारी को ही सपा में शामिल करने को लेकर मामूली रूप से शुरू हुआ विवाद आज किसी और रंग में रंग चुका है।
इसमें मुख्तार अंसारी का हालांकि कहीं नाम नहीं है। माना जा रहा था कि सदर विधानसभा से सपा अल्ताफ अंसारी का टिकट काटकर उन्हें दे देगी लेकिन अखिलेश की लिस्ट में नाम न होने पर मुख्तार अंसारी निर्दलीय चुनाव लड़ेंगे या शिवपाल के खेमे से उन्हें टिकट मिलेगा इसे लेकर सदर विधानसभा में हर पार्टियों के लोग इंतजार में हैं।