फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

नहीं निकलेगा दूल्हे का जुलूस, ना सजेगी रांगे की ताजिया

विज्ञापन
विज्ञापन
काशी में पहली बार मुहर्रम पर कोरोना संक्रमण के कारण कदीमी परंपराएं टूटेंगी। ना तो दूल्हे का जुलूस निकलेगा और ना ही रांगे की ताजिया सजेगी। संक्रमण को देखते हुए प्रशासन ने जुलूस और ताजिए पर प्रतिबंध लगा दिया है। ऐसी स्थिति में घरों में ही ताजिए सजाए जाएंगे। शिया जामा मस्जिद के प्रवक्ता हाजी सैयद फरमान हैदर ने बताया कि काशी में ही मुहर्रम के जुलूस गंगा जमुनी तहजीब का संदेश देते हैं। दूल्हे का जुलूस अंगारों पर चलता हुआ ताजियों को सलामी देते हुए मजहबी दीवारों को तोड़ता है। मुसलमानों के साथ हिंदू भी इस जुलूस को देखने केलिए जुटते हैं। कहते हैं कि गंगा किनारे जंगल में घोड़े की नाल मिली थी जिस पर हजरत इमाम हुसैन केभतीजे हजरत कासिम केखास निशान बने थे। नाल शिवाला में लाकर रख दी गई और तब से ही शिवाला से हर साल मुहर्रम पर दूल्हे का जुलूस निकलता है। लोग मानते हैं कि जैसे जुलूस में दूल्हे के सिर पर यह नाल रखी जाती है, उस पर सवारी आ जाती है। तब वह आम इंसान से बेहद पाक हो जाता है। इस जुलूस में एक लाख से अधिक लोग शरीक होते हैं। इसकी खासियत यही है कि पूरी दुनिया में इकलौता दूल्हे का जुलूस काशी में ही उठता है। जो इस बार कोरोना संक्रमण के कारण नहीं निकलेगा।
विज्ञापन

दूल्हे के इस जुलूस में शिया और सुन्नी की एकता की भी मिसाल देखने को मिलती है। यूं तो दूल्हे का इमामबाड़ा सुन्नी जमात का है लेकिन 9वीं मुहर्रम को शिया समुदाय के लोग ही इमामबाड़े पर जाकर नौहे पढ़ते हैं। उसके बाद फातिहा पढ़ी जाती है। फ ातिहा पढने के दौरान ही जिसे दूल्हा बनाया जाता है वो वहां रखी तीन नाल में से दो नाल को पकड़ लेता है। और फिर ना तो वो नाल छोड़ता है और ना ही उसे कोई होश रहता है। इमामबाड़े के इर्द.गिर्द चक्कर लगाने के बाद यह जुलूस अपने निर्धारित रास्तों से होकर गुजरता है।
सिर्फ दूल्हे का ही जुलूस नहीं बनारस में मुहर्रम के दौरान ऐसे कई जुलूस निकलते हैं जो ना सिर्फ ऐतिहासिक हैं बल्कि पूरी दुनिया में इकलौते भी। दूल्हे की जुलूस की तरह ही 6 मुहर्रम को बनारस के कच्ची सराय से निकलने वाला 40 घंटे का जुलूस भी अपने आप में खास है। यह इकलौता जुलूस है जो कि लगातार 40 घंटे से भी अधिक समय तक चलता है।
विज्ञापन

खुशी के साज शहनाई पर भी यहां मातम की धुनें मुहर्रम के दौरान ही सुनने को मिलती हैं जिसकी रवायत खुद भारतरत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां ने शुरू की थी। पांचवीं मुहर्रम को दालमंडी से उठने वाले मुहर्रम के जुलूस में उस्ताद बिस्मिल्लाह खां शहनाई पर मातमी धुन बजाकर इमाम हुसैन और कर्बला के शहीदों को खिराजे अकीदत पेश किया करते थे। आज भी उनकी ये रवायत कायम है। अब उनके घरवाले इस परंपरा को निभा रहे हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें