कई मायने में खास है यह टुकड़ा।
- फोटो : अमर उजाला
चंद्रमा से मिट्टी कैसे ली गई?
चंद्रमा पर सारा रिकॉर्ड सुरक्षित है। वहां कोई नुकसान नहीं हुआ है। चीन ने 2020 में एक मानव रहित मिशन के दौरान ये मिट्टी हासिल की थी। हमने चीन से जो मिट्टी ली है उसे दो तरह से इकट्ठा किया गया है। पहला स्कूप और दूसरा ड्रिलिंग। स्कूप में चम्मच के सहारे रोबोट द्वारा सतह से मिट्टी ली गई। वहीं, दूसरे में चंद्रमा की सतह और उसके एक मीटर नीचे के दो सैंपल लिए गए। इन सैंपल के रासायनिक तत्वों की जांच की जा रही है। चंद्रमा और पृथ्वी के तत्व एक दूसरे में कैसे समाहित है, इसका पता लगाया जाएगा।
चांद पर खोज करने की प्रेरणा कैसे मिली?
बनारस से यूके आया तो लंदन स्थित नेचुरल हिस्ट्री म्यूजियम में उल्का पिंड के संग्रह पर अध्ययन किया। यहां देखा कि पूरी दुनिया में मिले उल्का पिंड और खगोलीय पत्थरों का बड़ा सैंपल था। इसमें से कई सैंपल के नाम यूपी के शहरों पर थे। इसमें से एक बनारस नाम से भी पिंड था।
1798 में बनारस में उल्का पिंड का टुकड़ा गिरा था। अंग्रेज उसे ब्रिटेन ले आए और म्यूजियम में संरक्षित कर दिया। 200 साल बाद बनारस नाम के पिंड देखने के बाद मन उत्साहित हुआ और पूरा फोकस चंद्रमा के रहस्यों को उजागर करने पर केंद्रित हो गया। रूस और अमेरिका में रखे चंद्रमा के पत्थरों पर रिसर्च शुरू किया। पहले अंतरिक्ष यात्री नील आर्मस्ट्राॅन्ग समेत कई अंतरिक्ष मिशन के दाैरान लाए गए सैंपल पर रिसर्च किया। नासा के साथ काम किया।
कई मायने में खास है यह टुकड़ा।
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आपने चांद पर पानी कैसे खोजा?
अपोलो मिशन के बाद चंद्रमा से कुछ पत्थर आए थे। अध्ययन करने के बाद वैज्ञानिकों की टीम ने पानी का पता लगाया, जिसमें मैं भी शामिल रहा। ये पानी बूंद में नहीं था। बल्कि दो हाइड्रोजन और एक ऑक्सीजन के रूप में था। फिर केमिकल टेस्ट कर ये पता लगाया कि ब्रह्मांड में पानी कहां से आया। पानी क्षुद्रग्रहों से आया। हालांकि, भारी मात्रा में हाइड्रोजन सूर्य से मिला।
बीएचयू और बनारस से आपका कितना लगाव है। क्या बीएचयू के साथ इस क्षेत्र में कभी कोई समझौता करेंगे?
मैं चाहता हूं कि भारत और खासकर बनारस के युवाओं का वैज्ञानिक रुझान बढ़ाया जाए। उन्हें अगली पीढ़ी के वैज्ञानिकों के साथ काम करता देखूं और वे भारत को नई ऊंचाइयां दें। पिछले 25 वर्षों में मैं कई बार बीएचयू आया।