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महेश नवमी: काशी में 66 साल से धूमधाम से मनाया जा रहा उत्सव, 20 साल से निकल रही कलश शोभायात्रा

Tue, 11 Jun 2024 08:37 PM IST
प्रगति चंद अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।

सार

वाराणसी में 66 साल से महेश नवमी का उत्सव धूमधाम से मनाया जा रहा है। काशी में माहेश्वरी समाज के लोग ढाई सौ साल से निवास कर रहे हैं, लेकिन उन्हें अपने समाज के सबसे बड़े पर्व महेश नवमी की जानकारी नहीं थी। 66 वर्ष पहले उन्हें इसकी जानकारी हुई। तभी से उत्सव मना रहे हैं। 
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varanasi news - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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बनारस उत्सवों का शहर है। यहां विभिन्न वर्ग और समाज लगातार कोई न कोई उत्सव मनाते हैं। उन्हीं में एक है माहेश्वरी समाज। काशी में माहेश्वरी समाज के लोग ढाई सौ सालों से निवास कर रहे हैं, लेकिन उन्हें अपने समाज के सबसे बड़े पर्व महेश नवमी की जानकारी नहीं थी। 66 वर्ष पहले उन्हें इसकी जानकारी हुई। तब से समाज के लोग धूमधाम से इसे मनाते हैं।

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अखिल भारतीय माहेश्वरी महासभा का गठन सवा सौ साल पहले हुआ। तब से देशभर में महेश नवमी का आयोजन शुरू हुआ। इस संगठन के पूर्वी उत्तर प्रदेश के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष श्रीराम माहेश्वरी ने बताया कि महेश नवमी के दिन ही माहेश्वरी समाज का उद्भव हुआ था। मगर इस दिन उत्सव देश में महासभा के गठन के बाद मनाना शुरू हुआ। बनारस में इसकी शाखा (माहेश्वरी परिषद) करीब 66 साल पहले शुरू हुई। फिर इसकी उसके विविध प्रकार बने। 

10 साल पहले तक सामूहिक रूप से भगवान महेश की पूजा सहित विविध अनुष्ठान होते थे। मगर संगठन ने अभियान चलाकर इसको माहेश्वरी समाज के घरों तक पहुंचाया। अब घर-घर में भगवान महेश का पूजन-अर्चन और स्तुति होती है। इसके अलावा पकवान बनाए जाते हैं। लोग नए कपड़े पहनकर एक-दूसरे को बधाई देते हैं। छोटे-बड़ों से आशीर्वाद लेते हैं और बड़े बच्चों को त्योहारी (उपहार) देते हैं। परिषद के प्रचार मंत्री गौरव राठी ने बताया कि इस बार महेश नवमी 15 जून को है। इस दिन सांस्कृतिक कार्यक्रम, रक्तदान, पर्यावरण संरक्षण जागरूकता आदि कार्यक्रम होंगे।

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इसलिए मनाते हैं महेश नवमी

श्रीराम माहेश्वरी ने बताया कि लोहारगल (राजस्थान) के राजा खड़ग सिंह को यज्ञ के बाद पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। पुत्र सुजान कुंवर ने गद्दी संभालने के बाद जैन धर्म स्वीकार कर लिया। उसने सैनिकों के माध्यम से ऋषियों के यज्ञ को भंग कर दिया। इससे क्रोधित ऋषियों ने श्राप दिया। जिससे कुंवर सहित सभी लोहा बन गए। इसकी खबर लोहारगल के लोगों को पता चली तो वहां की महिलाओं ने भगवान शिव और पार्वती की तपस्या की। फिर ज्येष्ठ माह की नवमी तिथि को भगवान शिव ने उन्हें पुन: मनुष्य रूप में परिवर्तित कर दिया। तब से इस दिन को महेश नवमी मनाई जाती है

20 सालों से निकल रही कलश शोभायात्रा
महेश नवमी पर पहले समाज के लोग सिर्फ श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर में जलाभिषेक करते थे। इधर 20 सालों से कलश शोभायात्रा निकाली जाती है। समाज की महिलाएं और पुरुष दशाश्वमेध घाट से गाजेबाजे के साथ जलपूरित कलश लेकर बाबा दरबार पहुंचते हैं और बाबा का अभिषेक करते हैं।
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