महामूर्ख सम्मेलन का आयोजन
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डेढ़सी पुल से हुई थी शुरूआत
महामूर्ख मेला के संयोजक सुदामा तिवारी सांड़ बनारसी बताते हैं कि 55 साल पहले महामूर्ख मेले की शुरुआत डेढ़सी पुल से हुई थी। उस दौरान चकाचक बनारसी, बेढब बनारसी, मोहनलाल गुप्त भइयाजी बनारसी, माधव प्रसाद मिश्र (एम भारती), केदारनाथ गुप्त, धर्मशील चतुर्वेदी व सांड़ बनारसी ने डेढ़सी पुल से की थी। इसके बाद पं. करुणापति त्रिपाठी ने इसको बजड़े पर करने को कहा। इसके बाद चौक थाने के सामने भद्दोमल की कोठी पर आयोजन होने लगा और कोठी जब ध्वस्त हो गई तो चौक थाने में भी महामूर्ख मेला सजने लगा। बाद में यह आयोजन घोड़ा घाट (डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद घाट) पर शुरू हुआ।
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बेमेल विवाह का साक्षी है महामूर्ख मेला
महामूर्ख मेला में अब तक न जाने कितने ही विशिष्ट जन बेमेल विवाह के बंधन में बंध चुके हैं। इसमें पुरुष दुल्हन और महिला दूल्हा बनती है। कार्यक्रम की शुरुआत गर्दभ (गधा) ध्वनि से होता है। चीपो चीपो की आवाज से जब घाट गूंजने लगता है तो पूरा माहौल ठहाकों से गूंज उठता है। इसमें दूल्हा-दुल्हन बनने वालों में पीलू मोदी, महेन्द्र शाह, सुनील शास्त्री, पं. लोकपति त्रिपाठी, चन्द्रा त्रिपाठी, श्याम लाल यादव, शैल चतुर्वेदी, गोविंद अग्रवाल, डाॅ. अनुराग टंडन, डाॅ. शालिनी टंडन आदि कई विशिष्ट जनों के नाम जुड़े हैं।
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जीवन की सबसे बड़ी मूर्खता है विवाह
मेले के संचालक व हास्य कवि दमदार बनारसी ने बताया कि महामूर्ख मेला काव्य साहित्यिक जगत का अविरल मेला है। गंगा के तट पर सजने वाला महामूर्ख मेला इस सोच से आरंभ किया गया था कि आज हर कोई मूर्ख है। जीवन की सबसे बड़ी मूर्खता विवाह है और इसी के आधार पर बेमेल विवाह का आयोजन होता है। कवियों को उटपटांग उपहार देकर सम्मानित किया जाता है।