महा महोपाध्याय पं. गोपीनाथ कविराज महान दार्शनिक केवल तंत्र शास्त्र ही नहीं वेद-वेदांग, न्याय, सांख्य-योग, बौद्ध धर्म, जैन धर्म, दर्शन के महान ज्ञाता थे। तत्कालीन विद्वान उन्हें चलता फिरता विश्वकोश कहते थे, शास्त्र उनकी जुबान पर रटे हुए थे। देश ही नहीं दुनिया भर से विद्वान उनसे शिक्षा लेने काशी आते थे। उन्होंने पूरी दुनिया में तंत्र शास्त्र को स्थापित किया और एक अलग पहचान दिलाई। उनकी ही देन थी कि संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में तंत्रागम विभाग स्थापित हुआ। 12 जून 1976 को उनका निधन वाराणसी में ही हुआ था।
जनसंपर्क अधिकारी शशींद्र मिश्र ने बताया कि महामहोपाध्याय पं. गोपीनाथ कविराज ने योगिराज विशुद्धानंद परमहंस देव से मलदहिया स्थित विशुद्धानंद कानन में तंत्र की दीक्षा ली थी। गुरु विशुद्धानंद की आध्यात्मिक चिंतन धारा को विस्तार देकर सात समंदर पार तक पहुंचाया। उन्होंने योग क्रिया पर आधारित कई पुस्तकें लिखी हैं जिनमें से अधिकांश आज भी सरस्वती भवन में संग्रहीत हैं। भारतीय शास्त्रों के अलावा कुरान, बाइबिल पर उनका समान अधिकार था। उनके शिष्यों में कई मुसलमान और ईसाई भी थे।
पुस्तकालयाध्यक्ष से प्राचार्य तक का किया सफर
पं. गोपीनाथ कविराज का जन्म सात सितंबर 1887 को ढाका (बांग्लादेश) में हुआ था। प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा जयपुर में होने के बाद क्वींस कालेज में भी उन्होंने पढ़ाई की थी। सन 1913 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एमए किया और सन 1914 में तत्कालीन संस्कृत कॉलेज के सरस्वती भवन पुस्तकालय में पुस्तकालयाध्यक्ष की नौकरी शुरू की। 1923 में वह डॉ. ए वेनिस के बाद संस्कृत कॉलेज के प्राचार्य बने और 14 साल तक संस्था के प्राचार्य के रूप में सेवा करने के बाद 1937 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली।