इस दौरान ही पान भी चढ़ता है। वही परंपरा जब काशी में 217 साल पहले शुरू हुई तो यहां भी भगवान को पान का प्रसाद चढ़ने लगा। मंदिर के ट्रस्टी दीपक शापुरी ने बताया कि भगवान को पान का प्रसाद चढ़ाने की परंपरा है।
मुंह में घुल जाता है पान
औरंगाबाद के गोपाल पान भंडार के कृष्णा चौरसिया ने बताया कि मगही पान और अन्य पान में बहुत अंतर है। मगही पान अगर पीला है तो वह खाने पर मुंह में अपने आप घुल जाता है जबकि अन्य पान को चबाना पड़ता है।
उन्होंने बताया कि सामान्य पान जहां एक हजार रुपये में दो सौ मिल रहे हैं वहीं मगही की कीमत पांच हजार रुपये प्रति 200 पान हो गई है। रथयात्रा मेला के लिए मगही पान बचाकर रखते हैं। इसके बाद ही मगही पान मिलना बंद हो जाता है, फिर अक्टूबर नवंबर से मिलना शुरू होता है।