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लोलार्क छठ 17 सितंबर को: सात साल बाद बन रहे सात महायोग, लोलार्क कुंड में उमड़ेगा आस्था का सैलाब

Sat, 12 Sep 2026 02:36 PM IST
Pragati Chand अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।

सार

वाराणसी में लोलार्क छठ का पर्व 17 सितंबर को मनाया जाएगा। इस बार सात साल बाद सात महायोग में दंपति लोलार्क कुंड में आस्था की डुबकी लगाएंगे। साथ ही संतान प्राप्ति की कामना करेंगे।  
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लोलार्क कुंड में डुबकी लगाते लोग। -फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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लोलार्क छठ का पर्व 17 सितंबर को मनाया जाएगा। इस बार सात साल बाद लोलार्क षष्ठी पर सात महायोग बन रहे हैं, जिनमें सिद्धि योग, राजयोग और पांच महापुरुष योग शामिल हैं। इस दिन सुबह 6:31 से 10:26 बजे तक स्नान व पूजा का सर्वोत्तम मुहूर्त है। सर्वार्थ सिद्धि योग बनने से इस पर्व का फल और बढ़ जाएगा। इस पर्व पर लोलार्क कुंड पर आस्था का मेला लगेगा। पूर्वांचल के अलावा दिल्ली, बिहार, झारखंड, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ आदि राज्यों से श्रद्धालु इस कुंड में स्नान कर लोलार्केश्वर महादेव के दर्शन के लिए आएंगे। 

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मान्यतानुसार संतान प्राप्ति की कामना के लिए दंपती इस कुंड में स्नान करते हैं। हिंदू पंचांग के अनुसार लोलार्क छठ (लोलार्क षष्ठी) के प्रसिद्ध मेले भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि पर 17 सितंबर को भदैनी क्षेत्र में स्थित ऐतिहासिक लोलार्क कुंड में स्नान के लिए भीड़ उमड़ेगी। 

श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर न्यास के पूर्व अध्यक्ष प्रख्यात ज्योतिषविद प्रो. नागेंद्र पांडेय ने बताया कि भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि 16 सितंबर को सुबह 8:55 बजे से अगले दिन सुबह 10:26 बजे तक रहेगी। उदया तिथि के चलते 17 को लोलार्क छठ मनाया जाएगा। उन्होंने बताया कि लोल का अर्थ चंचल और अर्क का अर्थ सूर्य होता है। यानी भादो मास में आसमान में बादलों के चलते सूर्य चंचल होते हैं। इस तिथि को दिखाई देते हैं। पुराणों में इस तिथि की विशेष प्रतिष्ठा बताई गई है। इस कुंड में दंपतियों के स्नान से संतान प्राप्ति में आने वाली बाधा दूर हो जाती है।

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कुंड के पास ही स्थित लोलार्केश्वर महादेव मंदिर के महंत पं. शिव प्रसाद पांडेय लिंगिया महाराज ने बताया कि यह सूर्य कुंड है। मान्यता है कि सूर्य देव के रथ का पहिया यहीं पर धंसा था। इसके चलते गड्ढा हो गया और पानी आने लगा था। बताया कि पश्चिम बंगाल स्थित कूचबिहार स्टेट के राजा चर्मरोग से पीड़ित थे और उनकी कोई संतान नहीं थी। 

एक बार काशी घूमने आए और इसी कुंड में स्नान किया तो उनका यह रोग दूर हो गया और उन्हें पुत्र की प्राप्ति भी हुई। इसके बाद उन्होंने इस कुंड के अंदर की सीढ़ियां सोने की बनवाईं और सात मन तांबे से सात जालियां बनवाईं। इसी से पानी छनकर निकलता है। इस कुंड का उल्लेख महाभारत में भी मिलता है। बाद में रानी अहिल्याबाई होल्कर ने इस कुंड के चारों तरफ कीमती पत्थरों से सजावट करवाई थी। आचार्य दैवज्ञ कृष्ण शास्त्री के अनुसार इस लोलार्क षष्ठी पर कुल सात योग बन रहे हैं। 
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स्नान और पूजा का उत्तम मुहूर्त 
लोलार्क षष्ठी पर सुबह 3:55 से 5:40 तक ब्रह्म मुहूर्त रहेगा। सुबह 5:41 से 6:30 बजे तक विजय मुहूर्त है, जो शारीरिक बाधाओं को दूर करता है और शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने में सहायक होता है। इसके बाद सुबह 6:31 से 10:26 तक सर्वोत्तम मुहूर्त है। इसके बाद उदयकालीन होने से सूर्यास्त तक स्नान-दान और दर्शन-पूजा होगी।
 
सूर्य की किरणें कुंड पर होती हैं प्रभावी
वैज्ञानिक आधार पर लोलार्क कुंड की बनावट कुछ इस तांत्रिक विधि से की गई है कि भादो की षष्ठी तिथि को सूर्य की किरणें इस कुंड की जगह पर प्रभावी होती हैं। किरणों के पानी में पड़ने से संतान उत्पत्ति का योग बनता है। इनके अलावा साधु-संन्यासी स्नान करते हैं तो उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है।

संतान प्राप्ति तक एक फल का त्याग
लोलार्क षष्ठी पर लोलार्क कुंड में अपने कपड़े छोड़ने और एक फल का त्याग करने का विधान है। पं. शिव प्रसाद पांडेय ने बताया कि स्नान के दौरान एक फल वहां चढ़ाकर छोड़ देते हैं। इस फल को जब तक संतान की प्राप्ति नहीं हो जाती है, तब तक उसे ग्रहण नहीं करते हैं। लोकमान्यता है कि स्नान करने वाले अपना पूरा वस्त्र त्याग देते हैं।
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