काशी की संस्कृति में रचे-बसे मारवाड़ी, सिंधी, गुजराती, मराठी, बंगाली, उत्तराखंड के कुमाऊं समाज की होली के रंग दिखेंगे। कुमाऊं की बैठकी की होली होगी तो कहीं अपने कुलदेवों के साथ लोग होली खेलेंगे। गुजराती समाज के लोग गोपाल मंदिर में ठाकुर जी के साथ होली खेलेंगे। कुलदेवी सिद्ध माता के दर्शनकर अबीर गुलाल चढ़ाएंगे। विशेष मिठाई श्रीखंड बनाई जाएगी। वहीं, मारवाड़ी समाज में महिलाएं व कुंवारी कन्याएं गणगौर माता का पूजन शुरू करेंगी जो 16 दिनों तक चलेगा। राजस्थानी गुझिया, काजीबाड़ा विशेष पकवान बनाए जाएंगे।
वहीं, उत्तराखंड के कुमाऊं समाज में चीरबंधन व चीरदहन का खासा महत्व है। होली के एक दिन चीरदहन होता है। 10 दिन पहले से ही होली शुरू हो जाती है। होली के दिन बैठकी की होली महिलाएं व पुरुष अलग-अलग खेलते हैं। सिंधी समाज अपने आराध्यदेव झूलेलाल की पूजा कर होली खेलेंगे। बंगाली समाज में आराध्यदेवी मां काली को अबीर गुलाल चढ़ाकर पूजा करेंगे। दिन में 12 बजे खेलेंगे। विशेष व्यंजन में खीर बनाकर एक दूसरे को खिलाएंगे। अग्रवाल समाज में होली पर कांजी खास होता है। इसे अपनी बहन-बेटियों के यहां भेजते हैं। कांजी गन्ने के रस से तैयार की जाती है।