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क्वींस कॉलेज में किया था साइंस मैग्जीन का संपादन

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रस प्रधान साहित्य शब्द ब्रह्म का आनंदमय स्वरूप है। कुबेरनाथ राय की भाषा शैली विषयानुरूप होने के साथ-साथ विशेष लालित्य एवं रोचकता से युक्त होते हुए भी अनावश्यक अलंकरण से रहित है।
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उक्त बातें कुबेरनाथ राय की पुण्यतिथि की पूर्व संध्या पर नवगीतकार सुरेंद्र वाजपेयी ने बताईं। कहा कि उन्होंने छात्र जीवन में क्वींस कॉलेज की साइंस मैग्जीन का संपादन किया। बीएचयू की पत्रिका प्रज्ञा में भी वे लिखते रहे। उनके लेखन की व्यवस्थित शुरुआत 1962 में हुई। यह एक संयोग से जुड़ा है। इसी वर्ष संसद में शिक्षामंत्री प्रो. हुमायुं कबीर का भारत के इतिहास लेखन पर एक वक्तव्य आया। कुबेरनाथ राय इससे असहमत थे। इसके प्रतिवाद में उन्होंने इतिहास और शुक सारिका कथा शीर्षक से एक निबंध सरस्वती में भेजा। उनका निबंध प्रकाशित हुआ।
सुरेंद्र वाजपेयी ने बताया कि कुबेरनाथ राय की शैली गूढ़ चिंतन और गंभीरता प्रधान निबंधों की भाषा भी पैनापन लिए हुए थी। माधुर्य तथा ओज का मिश्रण, उक्ति वैचित्रय, इतिहास और पुराण का नूतन संदर्भ में प्रयोग, प्रतीकात्मक और चित्रात्मकता की विशेषताएं इनकी भाषा में स्पष्ट झलकती हैं। कुबेरनाथ राय की प्रारंभिक शिक्षा गांव मतसा के प्राथमिक विद्यालय में हुई। 12वीं तक की शिक्षा उन्होंने क्वींस इंटर कॉलेज से विज्ञान विषय में ग्रहण की। स्नातक उन्होंने गणित, दर्शन और अंग्रेजी विषयों के साथ बीएचयू से किया। परास्नातक के लिए कोलकाता (तत्कालीन कलकत्ता) चले गए। कुबेरनाथ राय के लेख जब वे आठवीं कक्षा में थे तभी से विशाल भारत और माधुरी में छपने लगे थे। उनका पहला ललित निबंध हेमंत की संध्या मार्च 1964 के धर्मयुग के अंक में छपा। पांच जून 1996 तक उन्होंने लगभग 250 निबंध लिखे।
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जन्म 26 मार्च 1933, मतसा, गाजीपुर
मृत्यु- 5 जून 1996 (आयु 63 वर्ष)
उल्लेखनीय कार्य-गंध मादन, प्रिया नील-कांति, रस आकाश, विषद योग
पुरस्कार-भारतीय ज्ञानपीठ
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