कजरी के आरंभ का वास्तविक काल बताना तो मुश्किल है लेकिन काजर सरीखे सांवरे बादलों को देखकर ही कजरी गायन का उद्भव माना जाता है। यह कहना है लोक गायिका सरोज वर्मा का। कजरी की शैलियों पर शोध कर चुकीं सरोज बताती हैं कि विंध्याचल में कज्जला देवी की आराधना सावन में होती है। स्त्रियां सावन में कजरी गाकर तरह-तरह से उत्सव मनाती हैं।
वह कहती हैं कि सावन में वर्ष भर की उदासी दूर हो जाती है। इस महीने की फुहार में स्त्रियां प्रफुल्लित होती हैं। हथेलियों में मेहंदी रचाकर हाथों में भर बांह हरी चूड़ियां, हरी चुनरी पहनकर झूला झूलते हुए कजरी गाने का मजा ही कुछ और होता है। यह आनंद आपको गंवई परिवेश में ही मिलेगा। जिनके घरों में नई दुल्हन आती है, वहां कजरी-तीज का उत्सव खास होता है।
कजरी में ‘कहन’ भी होता है। दो समूहों में सवाल, जवाब को कहन कहते हैं। सरोज बताती हैं कि वैसे तो कजरी बनारस की ही देन है। मिर्जापुर में भी कजरी के अखाड़े रहे हैं। वह गाती हैं- कइसे खेले जइबू सावन में कजरिया बदरिया घेरि आई ननदी। बताती हैं कि एक समूह भौजाइयों का होता है तो दूसरा ननदों का। ननद के समूह से जवाब आता है- अबकी खेले जइबे सावन में कजरिया बदरिया घेरि आई भउजी...।
इसी तरह पत्नी अपने पति से वर्षों का करार पूरा करने की जिद कजरी में कैसे करती है, इसकी एक बानगी देखिए- बतिया माना बलम कलकतिया/हमके गढ़ाय दा नथिया ना...। बिन नथिया तोहसे नाहीं बोलबै/ हमके गढ़ाय दा नथिया ना... नाहीं ता होइहें बलम आफतिया...।
वह कहती हैं कि बारिश का समय हो और किसी गरीब की मड़ई का छाजन टपक रहा तो दूसरे तरह की कजरी निकलती है । तब गरीब महिला कजरी में संवाद करती है है- छन्हियां टपकत बा बरसतिया रतिया डाहे सवतिया ना... एक त पवन चले झकझोरि, दूसरे बनल नहरिया ओरी, तीसरे मन के जोरा -जोरी संगवे कई विपतिया ना...। इसी तरह कजरी गंगा दशहरा से शुरू होती है भादों में हरितालिका तीज तक गाई जाती है।