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बीएचयू में प्रोफेसर पर हमला प्रकरण: शिक्षक बनने से एक कदम दूर था कासिम बाबू, छह नंबर पाकर बना टॉप-10 आवेदक

Sun, 07 Sep 2025 09:51 AM IST
प्रगति चंद हिमांशु अस्थाना, अमर उजाला ब्यूरो, वाराणसी।

सार

बीएचयू में विभागाध्यक्ष प्रो. सीएस रामामूर्ति पर हमले का सूत्रधार कासिम मैसूर यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर नहीं सिर्फ प्रोजेक्ट पर काम करता था। वह बीएचयू में शिक्षक बनने से एक कदम दूर था। टॉप-10 आवेदकों में वह शामिल हुआ था। 
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बनारस हिंदी विश्वविद्यालय, BHU - फोटो : X (@bhupro)
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विस्तार
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बीएचयू के तेलुगु प्रोफेसर पर हमले का सूत्रधार कासिम बाबू बीएचयू में प्रोफेसर बनने से सिर्फ एक कदम ही दूर था। वह टॉप-10 आवेदकों में शामिल हो गया था। सिर्फ इंटरव्यू की औपचारिकता पूरी करनी थी। हमले कराने वाले मास्टरमाइंड के गुरु और तेलुगु के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. बुदाती वेंकटेश्वर लू अपने करीबी कासिम बाबू को असिस्टेंट प्रोफेसर के इंटरव्यू के लिए तैयार करा रहे थे। तभी वर्तमान विभागाध्यक्ष प्रो. सीएस रामामूर्ति ने संभावनाओं पर पानी फेर दिया।

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रिक्रूटमेंट एंड एसेसमेंट सेल (आरएसी) ने प्रो. रामामूर्ति को तेलुगु आवेदकों का विवरण भेजा तो जांच में पता चला कि कासिम बाबू ने तीन साल तक मैसूर में प्रोजेक्ट में ही काम किया है। उसके इसी प्रोजेक्ट वर्क को पीडीएफ में कंन्वर्ट करने की प्रक्रिया के तहत पोस्ट डॉक्टोरल फेलो (पीडीएफ) की तरह से 6 अतिरिक्त नंबर दे दिए गए। इससे वह इंटरव्यू के लिए बीएचयू के टॉप 10 आवेदकों में शामिल हो गया और उसकी दावेदारी असिस्टेंट प्रोफेसर के लिए पक्की हो गई थी। 

ऐसे हुआ खुलासा

आरएसी के संदेह होने पर जब फाइल विभाग में भेजी गई तो इसका खुलासा हुआ। मुद्दे को उच्चाधिकारियों के सामने लाया तो तेलुगु विभागाध्यक्ष प्रो. मूर्ति की अध्यक्षता में कमेटी बनी और तमिल विभाग के डॉ. जैक जगदीशन सदस्य थे। जांच रिपोर्ट में कासिम बाबू की दावेदारी को सही नहीं पाया गया। आरोपियों की ओर से ऐसा माना जा रहा था कि आरएसी में भेजा गया विवरण दोबारा विभाग में नहीं आएगा, क्योंकि ऐसा करने से पहले आरोपी प्रो. लू ही चार्ज पर थे।

कई साल से मैसूर यूनिवर्सिटी में कर रहा था काम

कासिम बाबू मैसूर यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर नहीं बल्कि एक प्रोजेक्ट में निजी तौर पर कई साल से काम कर रहा था। वेतन 30 से 50 हजार मासिक था। छह साल के प्रोजेक्ट वर्क को पीडीएफ में कन्वर्ट करने की प्रक्रिया से जबकि खुलासे के दौरान असिस्टेंट प्रोफेसर की बात हुई थी। कासिम बाबू की दावेदारी खत्म होने के बाद प्रो. वेंकटेश्वर लू और कासिम बाबू के अंदर प्रतिशोध की भावना बनी। इसके बाद असिस्टेंट प्रोफेसर पद के विज्ञापन को हाईकोर्ट में चुनौती दे दी गई, जिससे भर्ती की प्रक्रिया पर रोक लगा दी गई। दो साल से तेलुगु विभाग में दो ही प्रोफेसर पढ़ाई करा रहे हैं। जबकि एक पोस्ट खाली है।

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प्रो. वेंकटेश्वर का कार्यकाल छह महीने बाद ही शुरू होने वाला था। विभागाध्यक्ष के रहते असिस्टेंट प्रोफेसर बनाने की प्रक्रिया काफी आसान हो जाती। डीआरसी बैठक में आराम से इसे पारित कराया जा सकता था। वहीं रिक्रूटमेंट एंड एसेसमेंट सेल की ओर से जितनी भी फाइलें विभाग को भेजी जातीं वह सब उचित करार दे दिया जाता। आरोपियों को उम्मीद थी कि प्रो. रामामूर्ति के बाद विभागाध्यक्ष का कार्यभार प्रो. वेंकटेश्वर लू के हाथ में होगा। ऐसे में उनसे आसानी से काम कराया जा सकता था।
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तीन साल से बात नहीं की, हमले के बाद जाना कुशलक्षेम

आरोपी प्रोफेसर वेंकटेश्वर लू के विभागाध्यक्ष का कार्यकाल समाप्त हुए तीन साल हो गए और तब से उन्होंने विभागाध्यक्ष प्रो. मूर्ति से बात ही नहीं की। उनके चेंबर में प्रवेश तक नहीं किया, जबकि अगल बगल के ही कमरे में बैठते थे। जबकि प्रो. मूर्ति पर हमले के बाद सिंह द्वार पर विरोध और ट्रॉमा सेंटर में हाल चाल पूछने के लिए पहुंचे थे। महीने में 10 दिन से ज्यादा कक्षाएं भी नहीं लेते थे।

हमले के 15 दिन बाद खुलासा
28 जुलाई को प्रो. मूर्ति पर दो बदमाशों ने रॉड से मारकर दोनों हाथ तोड़ दिया था। तब से वह ट्रॉमा सेंटर में ही भर्ती थे। 15 दिन बाद वाराणसी पुलिस ने इस केस का खुलासा किया। गिरफ्तार आरोपियों में प्रो. लू का शोध छात्र ही हमले का मास्टर माइंड निकला। हमले के 28 दिन बाद बंधी पट्टी-प्लास्टर के साथ तेलुगु विभागाध्यक्ष प्रो. मूर्ति अपना कार्यभार संभाला।
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