राजघाट पर पीपों के बारूद में हुए विस्फोट से पूरी काशी दहल गई थी। राजघाट का किला इस विस्फोट से उड़ गया और अंग्रेजों की कई कोठियां भी जमींदोज हो गई थीं। पूरा राजघाट क्षेत्र मलबे में तब्दील हो गया था। विस्फोट में जो पीपे उड़े वो शहर के भीतरी और दूरदराज इलाकों में गिरे थे। यह भयानक विस्फोट आज से लगभग 171 साल पहले हुआ था। विस्फोट के बारे में इतिहास पूरी तरह से मौन है।
संवत 1907 वैशाख कृष्ण पंचमी की तिथि दिन बुधवार 1850 को रात डेढ़ बजे के करीब राजघाट पर नाव पर लदे बारूद के पीपे अचानक फट पड़े। तेज धमाका हुआ, मैगजीन में जब आग लगी और पीपे फटे तो पूरा किला तहस नहस हो गया। किले के साथ ही किले के नीचे बंधा पक्का घाट, मंदिर, हवेलियां सब नष्ट हो गए। विस्फोट से काशी के हजारों मकान हिल गए थे। इस भयानक पीपा विस्फोट का पूरा वर्णन उस समय बनारस के कवि पंडित लोकनाथ चतुर्वेदी ने 52पदों में किया है। यह ग्रंथ अप्राप्य और दुर्लभ है। पीपा बावनी से पता चलता है कि मिस्टर स्माल और मिस्टर हुई की कोठियां ध्वस्त हो गई थीं। स्माल की मेम विस्फोट की आवाज से इतना ज्यादा डर गईं कि उसकी मौत हो गई। मिस्टर चार्ल्स नामक सौदागर का नया बंगला ध्वस्त हो गया। काशी के इतिहास और धरोहरों पर शोध कर रहे बनारस बार के पूर्व महामंत्री नित्यानंद राय ने बताया कि आज से 171 साल पहले राजघाट का किला सही सलामत था। अंग्रेजों का इस किले पर कब्जा था। उस समय डफरिन ब्रिज नहीं बना था। विस्फोट का कारनामा हो सकता है किसी बनारसी ने ही कर दिया हो क्योंकि उन दिनों बनारसियों के दिलोदिमाग में ब्रिटिश हुकू मत के खिलाफ जबरदस्त नफरत और बगावती तेवर थे। इस विस्फोट से अंग्रेजों का काफी नुकसान हुआ और ऐतिहासिक राजघाट का किला भी जमींदोज हो गया।