विश्वनाथ धाम में रुद्राभिषेक करते सीईओ विश्वभूषण मिश्र
- फोटो : मंदिर प्रशासन
डॉ. मिश्रा ने बताया कि भक्तों की औसत संख्या के आधार पर की गई व्यवस्था ज्यादातर श्रद्धालुओं के लिए नाकाफी होती। वहीं अधिकतम श्रद्धालु संख्या के अनुसार की गई व्यवस्था सामान्य दिनों में दर्शन के समय को बढ़ा देती और खर्चीली भी होती है। ऐसे में अलग-अलग मौकों के लिए अलग व्यवस्था बनाना किफायती और फायदेमंद रहा। इस एसओपी को कम से कम समय में भी लागू किया जा सकता है।
इसे भी पढ़ें; यूपी: आतंकी नेटवर्क की जांच में आजमगढ़ कनेक्शन, एनआईए की सूची में सात नाम; सुरक्षा एजेंसियों की जांच तेज
ये व्यवस्था किसी अधिकारी, कर्मचारी या सेवा प्रदाता पर निर्भर नहीं थी जिससे किसी कर्मचारी के बदलने से सेवा का कोई मानक नहीं बदला। ये एसओपी संस्थागत प्रणाली पर आधारित थी। एसओपी में पूरे धाम परिसर को अलग-अलग परिचालन क्षेत्रों में बांटना, सफाई की टाइम लाइन, उत्तरदायित्व तय करना, स्वतंत्र निरीक्षण की व्यवस्था और डिजिटल माध्यम से कार्यों को पूरा करना भी प्रमुख रहा। सामान्य दिनों और पर्वों के लिए भी अलग-अलग कार्ययोजना भी होनी चाहिए।
श्री काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास की ओर से विकसित एसओपी में स्वच्छता के साथ ही ऋतु के आधार पर भी श्रद्धालुओं की सुविधाओं के लिए भी मानक तय किए गए हैं। वसंत ऋतु में जर्मन हैंगर, वर्षा में छाया की व्यवस्था, ग्रीष्म ऋतु में ग्लूकोज वितरण, शिशुओं को ओआरएस वितरण, पत्थरों पर चलने के लिए मुलायम जूट की मैट्स, इंडस्ट्रियल स्केल कूलर, मिस्ट फैन, शिशु दुग्धपान बूथ इत्यादि एसओपी के बड़े काम रहे।
वहीं उत्तर से दक्षिण तक के तीर्थ स्थलों के अनुष्ठानों को भी साझा किया गया। इसमें काशी रामेश्वरम तीर्थजल योजना, प्रयागराज से संगम का गंगाजल, रामेश्वरम और कोडी तीर्थम का सागर जल श्री विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग को नियमित भेजकर कर अभिषेक करना शामिल रहा। गंगा सप्तमी मनाने की शुरूआत मई 2024 से की गई। 100 से ज्यादा नवाचार वर्ष 2024 से 2026 के बीच किए गए।