वाराणसी। प्रकृति में हर कहीं बिखरें हैं रंग। ये रंग ही हैं जो हमारी पृथ्वी के साथ हमारी जिंदगी को भी रंगीन बना देते हैं। रंग-राग, आनंद-उमंग और प्रेम हर्षोल्लास का उत्सव होली हर किसी के मन भाती है। गीत-गवनई और हंसी-ठिठोली होली के रंग को इंद्रधनुषी बनाते हैं। मोक्ष की नगरी काशी में तो होली का रंग ही अनोखा है। जैसे तीनों लोकों से न्यारी काशी है वैसे ही शिवगणों की होली भी न्यारी है। रंगभरी एकादशी से रंगों की बरसात जो शुरू होती है वह लगातार छह दिन तक चलती है।
पद्मश्री डॉ. मालिनी अवस्थी का कहना है कि बाबा विश्वनाथ की नगरी में फागुनी बयार भारतीय संस्कृति का दीदार कराती है। संकरी गलियों से होली की सुरीली धुन, चौक-चौराहों के होली मिलन समारोह का तो कोई जोड़ ही नहीं है। महादेव न सिर्फ अपने कुनबे के साथ काशी में वास करते हैं बल्कि हर उत्सव में यहां के लोगों के साथ शामिल होते हैं। फागुन में भक्तों संग खेली गई होली की परंपरा आज भी काशी में जीवंत है। बाबा विश्वनाथ नेग में काशीवासियों को होली और हुड़दंग की अनुमति देते हैं। कहते हैं साल में एक बार होलिका दहन होता है, लेकिन महाकाल स्वरूप भगवान भोलेनाथ की रोज होली होती है। काशी के मणिकर्णिका घाट सहित प्रत्येक श्मशान घाट पर होने वाला नरमेध यज्ञ रूप होलिका दहन ही उनका अप्रतिम विलास है।
साहित्यकार डॉ. इंदीवर पांडेय कहते हैं कि रंगभरी एकादशी के दिन बाबा विश्वनाथ के दरबार से शुरू होने वाली होली का यह सिलसिला बुढ़वा मंगल तक चलता है। जोगीरा सारारारा... की हुंकार बनारस की होली का अलग अंदाज दरसाता है। यहां की खास मटका फोड़ होली और हुरियारों के ऊर्जामय लोकगीत हर किसी को अपने रंग में ढाल लेते हैं। फाग के रंग और सुबह-ए-बनारस का प्रगाढ़ रिश्ता यहां की विविधताओं का अहसास कराता है। गुझिया, मालपुवा, जलेबी और विविध मिठाइयों, नमकीनों की खुशबू के बीच रसभरी अक्खड़ मिजाजी और किसी को रंगे बिना नहीं छोड़ने वाली बनारस की होली नायाब है। जोगीरा की पुकार पर आसपास के हुरियारे वाह-वाही लगाए बिना नहीं रह सकते और यही विशेषता अल्हड़ मस्ती दर्शाती है। इसके अलावा रंग बरसे भीगे चुनर वाली, रंग बरसे... और होली खेले रघुबीरा अवध में होली खेले रघुबीरा जैसे गीतों की धुनें भी भांग और ठंडाई से सराबोर पूरे बनारस को ही झूमा देती हैं।
सामाजिक कार्यकर्ता भदैनी निवासी आरके पाठक का कहना है कि भांग और ठंडाई के बिना बनारसी होली की कल्पना भी नहीं कर सकते। यहां भांग को शिवजी का प्रसाद मानते हैं, जिसका रंग जमाने में मुख्य भूमिका होती है। भांग और ठंडाई की मिठास और ढोल-नगाड़ों की थाप पर जब काशी वासी मस्त होकर गाते हैं, तो उनके आसपास का मौजूद कोई भी शख्स शामिल हुए बिना नहीं रह सकता।