कारगिल युद्ध में हमारे सैनिकों ने अदम्य साहस की अनगिनत कहानियां लिखी थीं। कुछ रणबांकुरों को लोग वक्त के साथ भूल गए तो कुछ की वीरगाथाएं कम ही लोगों तक पहुंच पाईं। ऐसे ही एक जांबाज सैनिक थे चौबेपुर के सरसौल निवासी अलीम अली।
विज्ञापन
ऑपरेशन विजय के इस वीर से मिली जानकारी बताती है कि उस दौरान पाकिस्तान ने कायराना हमला किया था। फौलादी शरीर में आठ गोलियां लगने के बाद भी जिंदा बच गए 22 ग्रेनेडियर के नायक रहे अलीम अली ने अमर उजाला से खास मुलाकात में उस समय की यादें साझा कीं।
बताया, भारतीय सेना की टुकड़ी ने भी मृत मानते हुए उन्हें शवों के बीच छोड़ दिया था। अगर डॉक्टर की नजर उनके हिलते हुए पैर पर नहीं पड़ती तो शायद वह आज इस दुनिया में नहीं होती। उस मंजर को याद करते हैं तो आज भी उनकी भुजाएं फड़कने लगती हैं।
विज्ञापन
उनकी बातों में पाकिस्तान के प्रति बेलौस गुस्सा कड़वे शब्दों में बाहर निकलता है। अलीम अली के परिवार में पत्नी, तीन बेटियां और एक बेटा है। बच्चे चौबेपुर क्षेत्र के ही कॉलेज में पढ़ते हैं। अलीम अली बताते हैं कि ‘सर्वदा शक्तिशाली’ के सूत्र वाक्य पर अमल करने वाली बटालियन 1999 में हैदराबाद में थी। मई में बटालियन को कारगिल पहुंचने का आदेश दिया गया था।
आदेश के बाद 25 जवानों की एक टुकड़ी जुबार हिल पर पहुंच गई। दो जुलाई की देर रात कहा गया कि जुबार हिल के ही एक हिस्से में पाकिस्तानी सेना ने दो बंकर बना लिए हैं। तीन जुलाई की भोर में वह मौके पर पहुंच गए। देखा तो वहां कोई नहीं था। एक बार लगा बिना लड़े ही लड़ाई जीत ली।
जोशीले सैनिकों ने तिरंगा भी फहरा दिया। इसी बीच अचानक तीन तरफ से फायरिंग शुरू हो गई। इस पर बटालियन के जवानों ने अपने-अपने मोर्चे संभाल लिए। तीन घंटे हुए आमने-सामने के संघर्ष भारतीय सेना हावी रही। जब लड़ाई खत्म हुई, तब तक पाकिस्तान के कई जवान ढेर हो चुके थे।
आंखों के सामने मारे गए जुबैर और इश्तियाक
गोलियों के निशान दिखाते अलीम अली
- फोटो : अमर उजाला
जवानों ने पता लगाया कि वहां पाकिस्तान ने सात बंकर बनाए थे। पाकिस्तान के कई जवान मारे गए लेकिन सभी भारतीय जवान सुरक्षित थे। अगले दिन भोर में पाकिस्तानी सेना ने काउंटर अटैक किया। शाम तक की गई ताबड़तोड़ फायरिंग में बटालियन के सात जवान देश के लिए शहीद हो गए।
अलीम के भी हाथ में गोली लगी। कुछ देर बाद ही दुश्मन की गोली रिफ्लेक्ट कर उनके सीने में धंस गई। वह गिरे ही थे कि चार गोलियां घुटने में लगी। इसके बाद भी अलीम ने मोर्चा नहीं छोड़ा और देश के लिए लड़ते रहे। तभी वह बेहोश होकर करीब बीस फुट नीचे खाई में गिर गए और फिर उन्हें होश नहीं आया।
आमने-सामने की लड़ाई के बीच छह जुलाई की शाम बटालियन की मदद के लिए दूसरी टीम ने मौके पर पहुंच कर पाकिस्तानियों को भगाया। हालांकि तब तक ग्रेनेडियर बटालियन के 25 में से 10 जवान शहीद हो चुके थे।15 सैनिक जख्मी हाल में थे। पाकिस्तान के 70 में से 35 जवान मारे जा चुके थे।
खोजबीन के दौरान भारतीय सेना ने अन्य शहीद सैनिकों के साथ अलीम अली को भी तलाश लिया और शवों के बीच छोड़ दिया था। पोस्टमार्टम और कागजी कार्रवाई के दौरान एक डॉक्टर की निगाह उनके पैर पर पड़ी। उनका एक पैर हिल रहा था। आनन-फानन में उन्हें अस्पताल भेजा गया।
होश आया तो वह चडीगढ़ में सेना के अस्पताल में थे। उन्हें लगा कि पाकिस्तानी सेना के कब्जे में हैं। वह बड़बड़ाने लगे। इसके बाद डॉक्टर उन्हें व्हील चेयर पर बाहर ले गए और अस्पताल का बोर्ड दिखाकर बताया कि वह भारत में हैं...चंडीगढ़ में हैं...सुरक्षित हैं। तब जाकर उन्हें तसल्ली हुई।
अलीम अली अच्छे बाक्सर भी थे। मेरठ के जुबैर और गाजीपुर के इश्तियाक उनके जूनियर और अच्छे दोस्त भी थे। अलीम दोनों को बाक्सिंग सिखाते थे। तीन जुलाई को तीनों जुबार हिल के मोर्चे पर तैनात थे। अलीम के सामने ही जुबैर और इश्तियाक गोली लगी और वह शहीद हो गए। अलीम बताते हैं कि उस समय ऐसा लगा जैसे परिवार का कोई सदस्य चला गया हो।
पूर्वांचल के 11 शहीदों के परिजनों का जीटीसी में सम्मान आज
kargil war
कारगिल की लड़ाई में पूर्वांचल के 11 जवान शहीद हुए थे। इसमें नौ जवान अकेले गाजीपुर के थे। गाजीपुर के बधीपुर, भारोपुर निवासी कमलेश सिंह, सैदपुर बेलसाड़ी के एसएनएस यादव, बहादुरपुर भरौपुर के कमलेश सिंह, सैदपुर के मुस्तफाचक निवासी रामबिलास सिंह, मानपुर के हरि सिंह यादव, मुहम्मदाबाद के रामदुलार यादव, यहीं के इश्तियाक खान, मछिटी के जयप्रकाश, सैदपुर धानीपुर के संजय सिंह, आजमगढ़ जिले के अजान शहीद, दाउदपुर के रामसमुझ सिंह और बजनी गोसाईं के गुलाब सिंह शहीद हुए थे।
इन शहीदों की पत्नियों (वीर नारियों) को बुधवार को 39 जीटीसी के वार मेमोरियल ग्राउंड पर सम्मानित किया जाएगा। कारगिल के अलावा अन्य ऑपरेशन में शहीद जवानों के परिवार के लोगों को भी सम्मानित किया जाएगा।
भारत-पाकिस्तान कारगिल युद्घ : 1999
पाकिस्तान ने कश्मीर की पर्वत श्रृंखलाओं में सर्दियों में खराब मौसम के कारण छोड़ी गई भारतीय चौकियों पर गुपचुप तरीके से अपने सैनिकों को बैठा दिया। भारत सरकार को इसका पता चला तो कार्रवाई के लिए सेना को भेजा गया।
चोटियों पर बैठे पाक सैनिकों के लिए ढलानों से ऊपर बढ़ते भारतीय सैनिकों को मार गिराना बहुत आसान था। शुरू में भारतीय सैनिक काफी हताहत हुए लेकिन बाद में देश के रणबांकुरों ने रात के अंधेरे में हमले करना शुरू किया। अंतत: दुश्मन पीछे हटने पर मजबूर हो गए।
इस लड़ाई को बोफोर्स के इस्तेमाल, युवा भारतीय अफसरों और जवानों की शहादत के किस्सों, सबसे ज्यादा मीडिया कवरेज के लिए जाना गया, तो उधर पाकिस्तान सरकार की बुजदिली के लिए भी जाना गया जिसने अपने शहीदों की लाशों को भी राजनीति का मोहरा बनाया।
-------------------
युद्घ की अवधि : 74 दिन
युद्घ क्षेत्र : 520 किलोमीटर
भारतीय सैनिकों की तैनाती : 20,000
पाक घुसपैठिये : 1500
शहीद हुए भारतीय सैनिक : 500 से अधिक
मारे गए घुसपैठिये : 696 से अधिक
कुल खर्च : 5000 करोड़ रुपये