फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

कारे-कारे बदरा कारे-कारे कजरा कारे हैं पिया मोर...

Sat, 09 Jul 2016 02:10 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
विज्ञापन
विज्ञापन
प्रियतम से बिछड़ने की पीर ही मल्हार जैसे रागों को जन्म देती है। चाहे आषाढ़ हो या जेठ, यह पीड़ा वह मूल्य बन जाती है जिसे कलाकार अपनी स्वर साधना की कीमत के रूप में चुकाता है। वैसे भी एक विरही की घनीभूत पीड़ा से उद्भूत भावों का सागर कोई जब तक स्वर लहरी नहीं फूटती, तब तक हिलोरें नहीं लेता। प्रेम से उपजा आनंद और विरह से फूटी वेदना दोनों एक सिक्के के दो पहलू हैं। यह वजह है कि वर्षाऋतु के आगमन पर मेघों को संदेश वाहक बनाकर कजरी और मल्हार गाया जाने लगता है।
विज्ञापन



बनारस की जानी-मानी ठुमरी गायिका सुचरिता गुप्ता स्वरों को प्रकृति का दूत मानती हैं। कहती हैं कि मल्हार गायकी पर घटाओं का घिरना महज किस्सागोई नहीं, हकीकत है। ऐसी कई घटनाएं उन्हें याद हैं जब मल्हार और कजरी के आलापों पर मेघों से नहीं रहा गया और वे आसमान में उमड़ने, घुमड़ने लगे। शहनाई के जादूगर उस्ताद बिस्मिल्लाह खां जब कजरी की धुन बजाते थे, तब मेघ घुमड़ने लगते थे। उस्ताद को याद करते हुए उनकी प्रिय कजरी सुनाती हैं- बरसे बदरिया सावन की सावन मनभावन की...। फिर मुस्कुराते हुए इसके पीछे की एक बड़ी घटना का खुलासा भी करती हैं।


सुचरिता बताती हैं कि कम लोग जानते होंगे कि 1959 में विजय भट्ट की फिल्म ‘गूंज उठी शहनाई’ लता मंगेशकर का गाया गीत ‘दिल का खिलौना हाय टूट गया...’ कोई फिल्मी गाना नहीं, बनारस की कजरी है। अपनी इसी कजरी के संगीत से उस्ताद ने इस फिल्म के लिए लिखे गीत को संवारा था। उनका कहना है कि चाहे कोई बहुत बड़ा कलाकार हो या फिर साधारण गवैया। अगर, स्वरों का सही प्रयोग हो गया तो बादलों का बरसना तय है। चाहे वह बारिश बाहर हो या फिर भीतर। वह बताती हैं कि पांच वर्ष पहले दिसंबर में मैं जयपुर गई थी। पं. हनुमान सहाय का गायन हो रहा था। जब वह मल्हार गाने लगे, तब बादल घुमड़ने लगे और फिर बारिश होने लगी थी। बंदिश के बोल थे- उमड़ घुमड़ घिरि आई बदरिया...।
विज्ञापन



दूसरी घटना का जिक्र करती हैं कि एक बार भदोही में शिवरात्रि संगीत समारोह था। रात के दो बज रहे थे। संगीत प्रेमियों के आग्रह पर मैंने राग देस की बंदिश- कगवा सांची कहो, पिया आवन की मन भावन की...गाने लगी। लगा कि चारों तरफ घटाएं घिर गई हैं। पपीहे की हूक सुनाई देने लगी थी। वैसे आषाढ़ का यह वातावरण ही विरह का है। वह कहती हैं वर्षाऋतु में प्रियतम साथ में रहते हैं तो दुल्हन का मन लगा रहता है। अकेलापन तड़प पैदा करता है। प्रियतम से बिछड़ने की बंदिश वह सुनाती हैं-  सावन आए तुम नाहिं आए.../लिखि-लिखि पतिया उन संग लागी/नहिं आवे घन श्याम ...।


इसके बाद बनारस का दादरा गाने लगती हैं- भीग जाऊं मैं पिया बचाय लैहो, झरन लागी बदरिया...। एक और घटना का वह जिक्र करती हैं। अप्रैल में मैं लखनऊ गई थी। वहां पर बहुत गर्मी थी। आयोजक इब्राहिम ने मुझे ठुमरी उत्सव में बुलाया था। उन्होंने कहा कि इतनी गर्मी हो रही है कम से कम एक मल्हार हो जाए..। मल्हार सुनकर सुकून तो मिलेगा। ठुमरी की बंदिश मैंने गाई- ठाढ़ि गोरी चितवत बदरा की ओर/कारे-कारे बदरा कारे-कारे कजरा कारे हैं पिया मोर...। यह बंदिश गाने के बाद मैं ग्रीन रूम में बैठी ही थी कि कुछ लोग आए और कहने लगे कि बाहर बारिश हो रही है। मन लगाकर कजरी गाएं या मल्हार, बादल बरसेंगे ही।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें