फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

जब पीएम बनने के प्रस्ताव को पंडित कमलापति ने ठुकराया

Sun, 15 Jan 2017 04:07 PM IST
अनूप ओझा, अमर उजाला, वाराणसी
विज्ञापन
kamalapati tripathi indira gandhi - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन
कड़ी धूप हो या गुलमोहर की छांवों में/नंगी पीठ करे जब कोई गांवों में/ हम जैसे हैं वैसे ही पड़े रहेंगे/तुम जब आओगे मेरे विश्वासों के तेवर खड़े मिलेंगे...। यह पंक्तियां भारतीय राजनीति की कद्दावर हस्तियों में एक रहे पं. कमलापति त्रिपाठी पर सटीक बैठती हैं।
विज्ञापन


वैचारिक भिन्नता पर जहां उन्होंने 80 के दशक में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से भी टकराव मोल लेने में हिचक नहीं दिखाई। वहीं इंदिरा की हत्या के बाद उभरते मतभेद के कारण राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह द्वारा राजीव गांधी सरकार को बर्खास्त कर पंडित जी के नेतृत्व में वैकल्पिक सरकार के गठन के प्रस्ताव को भी उन्होंने ठुकरा कर जता दिया था कि वह भले टूट जाएं लेकिन भरोसा नहीं टूट सकता...। 

मार्च 1987 में जब तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह और प्रधानमंत्री राजीव गांधी के बीच मतभेद गहरा गए थे, तब की एक सनसनी खेज राजनीतिक घटना का खुलासा पं. कमलापति त्रिपाठी की चिट्ठियों से होता है।
विज्ञापन


डाक विधेयक को लेकर यह मतभेद इस कदर गहरा गया था कि राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह राजीव सरकार को बर्खास्त कर वैकल्पिक सरकार के गठन की योजना बना चुके थे। तब एक रात ज्ञानी जैल सिंह ने अपने करीबी पत्रकार को दूत के रूप में भेजकर पंडित जी को वैकल्पिक सरकार का प्रधानमंत्री बनाने का प्रस्ताव भिजवाया था। 

पंडित कमला पति त्रिपाठी के एक पत्र से इस दिलचस्प प्रसंग पर रोशनी पड़ती है। पंडित जी लिखते हैं कि 21 अप्रैल, 1987 की देर रात एक वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानी जैल सिंह के संदेशवाहक के रूप में उनसे मिलने 9 जनपथ स्थित आवास पर पहुंचे थे।

उनका कहना था कि ज्ञानी जी राजीव सरकार को बर्खास्त करना चाहते हैं। उनकी इच्छा है कि आप वैकल्पिक राष्ट्रीय सरकार का नेतृत्व संभालें। कुछ महीने यह सरकार काम करेगी, फिर चुनाव करा दिए जाएंगे। आप अपनी सहमति दें तो आगे की कार्रवाई बढ़ाई जाए।  
विज्ञापन

जब इंदिरा की टिप्पणी से नाराज हो रेलमंत्री पद छोड़ा

kamalapati tripathi - फोटो : अमर उजाला
पंडित जी ने तब कहा था कि ऐसा करना मेरी प्रवृत्ति और संस्कार दोनों में नहीं है। ज्ञानी जी ने लंबे समय तक देश की सेवा की है। स्वतंत्रता संग्राम में भी कष्ट सहा है। उनके प्रति मेरी श्रद्धा है, मित्र के नाते मेरी उनको सलाह है कि अपने लंबे राजनीतिक यश को नुकसान न पहुंचाएं। उन्हें संविधान में ऐसा कोई अधिकार नहीं है कि वह एक निर्वाचित बहुमत वाली सरकार को बर्खास्त कर सकें। 

अस्सी के दशक में कांग्रेस संगठन या सरकार में रहते हुए प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जैसी ताकतवर राजनेता से टकराव मोल लेना तो दूर उनकी किसी बात से असहमति जताने की हिमाकत भी कोई मंत्री नहीं कर सकता था।

लेकिन पंडित जी वैचारिक मतभेद खड़ा होने पर इंदिरा गांधी के भी आगे नहीं झुके थे। 77 में पराजय के बाद 1980 में मध्यावधि चुनाव के जरिए इंदिरा गांधी ने सरकार में वापसी की थी।

24 अक्तूबर, 80 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने एक प्रेस कांफ्रेंस में अपनी सरकार के कई विभागों के कामकाज की तारीफ के दौरान कहा था कि जनता पार्टी की सरकार में बिगड़ी व्यवस्था एक-एक कर पटरी पर आ रही है लेकिन रेल विभाग का काम अभी आशा के अनुरूप नहीं हो पा रहा है।

इस टिप्पणी के बाद ही सरकार में दूसरी बार रेल मंत्री बने पंडित जी ने इस्तीफा दे दिया था। 23 नवंबर, 80 को इंदिरा ने एक पत्र में लिखा कि- मुझे दुख है कि त्रिपाठी जी ने इस्तीफा दे दिया। मैं चाहती हूं कि वह कैबिनेट में रहें।

उन्होंने हम सबको अपना पूरा सहयोग देने का वादा किया है। तब 17 दिन तक इंदिरा ने पंडित जी से बात करने और इस्तीफा वापस कराने के लिए इंतजार भी किया था लेकिन पंडित जी ने अपना निर्णय नहीं बदला। 
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें