आसमान में इठलाती सतरंगी पतंगे, घरों से लेकर गंगाघाट और उस पार रेती पर भक्काटे की आवाज दिनभर गूंजती रही। यह सिलसिला सुबह से लेकर दिन ढलने तक चलता रहा। पतंगें जमी से लेकर आसमां में तैरती रहीं।
एक दूसरे की पतंग को काटने, पेच लड़ाने की होड़ मची रही। मौका था मकर संक्रांति का। इस पर्व पर युवा, बुजुर्ग, बच्चों और महिलाओं, सभी ने हाथ आजमाए। छतों और मैदानों पर डीजे भी बजते रहे।
गंगा किनारे पतंगबाज कभी-कभी पतंग को नदी के सतह तक ले आते थे और अचानक फिर से मंझे पर झटका देते ही आसमान की ओर उड़ान भर लेती थी। छतों पर डीजे की धुन पर मस्ती के साथ लोगों ने पतंग उड़ाया। महिलाओं ने भी हाथ आजमाए।
एक दूसरे की पतंग काटने की होड़ मची थी। एक कटी नहीं की दूसरी को ‘छोड़इया’ दे दी जाती थी। जैसे ही दूसरे की पतंग कटती, भक्काटे की आवाज गूंज उठती। कटी पतंग को लूटने वाले भी पीछे नहीं थे।
उड़ती पतंग में लंगड़ (मंझे में पत्थर बांधकर फेंकते और दूसरे को मंझे को फंसाकर खींचना) मारकर खींच लेते ओर पतंग लूट लेते। पूरे दिन दूकानों पर पतंगों और मंझों की खरीदारी होती रही।
नोटबंदी और नए वर्ष की शुभकामनाएं वाली पतंगों की सबसे ज्यादा मांग रही। पक्का महाल की गलियां मंझों से पटी रहीं। सिगरा, महमूरगंज, चौक, गोदौलिया, बेनियाबाग, लंका सहित सभी क्षेत्रों में पतंगबाजी हुई।