धर्म की नगरी काशी में अक्षय तृतीया पर धार्मिक अनुष्ठान की परंपरा है। श्री काशी विश्वनाथ समेत सभी शिव मंदिरों में जहां शिवलिंग पर जलधरी का इंतजाम किया जाता है वहीं विष्णु के मंदिरों में चंदन का लेप किया जाता है।
वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया 14 मई को श्री काशी विश्वनाथ दरबार में जलधरी अर्पित किया जाएगा। वैशाख की तपिश से बाबा को राहत दिलाने के लिए जलधरी से पूरे दिन गंगाजल शिवलिंग पर टपकता रहेगा। जलधरी में गंगाजल सीधे गंगा से पाइप के जरिए आएगा। मंगला आरती से पहले ही जलधरी अर्पित की जाएगी। सावन मास की पूर्णिमा तक जलधरी तक सिलसिला जारी रहेगा।
नटवर नागर भगवान श्रीकृष्ण को पूरे 21 दिन तक चंदन की शीतलता का इंतजाम किया गया है। पीएसी के जवानों ने पाइप लगाकर जलधरी को अस्थायी टंकी से जोड़ दिया है। इसके अलावा शहर के सभी द्वादश शिवलिंग, शिवमंदिरों और पंचक्रोशी परिक्रमा पथ पर स्थित शिवमंदिरों में जलधरी अर्पित की जाएगी।
अक्षय तृतीया पर भगवान श्री लक्ष्मीनारायण की प्रसन्नता के लिए व्रत एवं उपवास रखा जाता है। इस तिथि पर किए गए सभी धार्मिक कृत्य, दान व पुण्य के कार्य अक्षय होते हैं। ज्योतिषाचार्य विमल जैन ने बताया कि विष्णु धर्मोत्तर पुराण के लिए जो व्यक्ति अक्षय तृतीया का व्रत रखते हैं उसे सभी तीर्थों का फल प्राप्त हो जाता है। इस दिन अबूझ मुहूर्त की मान्यता है।
इस दिन भगवान विष्णु, लक्ष्मीजी तथा कृष्णजी की पंचोपचार एवं दशोपचार अथवा षोडशोपचार पूजन का विधान है। शिवपुराण में वर्णन है कि भगवान शिव व माता पार्वती को मालती, मल्लिका, जया, चंपा एवं कमल के पुष्पों से पूजा-अर्चना कर मनुष्य के कोटि-कोटि जन्म के तन, मन और वचन से किए गए महापाप भी नष्ट हो जाते हैं। अक्षय तृतीया शुक्रवार को प्रात: 5:39 पर लगेगी और 15 मई को 8 बजे सुबह तक रहेगी।