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काशी उत्सव में बौद्धिक चर्चा: संत कबीर और रैदास के बेगमपुरा में नहीं है कोई भेदभाव

Thu, 18 Nov 2021 12:55 AM IST
उत्पल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी

सार

वाराणसी में आयोजित तीन दिवसीय काशी उत्सव के दूसरे दिन बुधवार को रुद्राक्ष कन्वेंशन सेंटर में साहित्यिक सम्मेलन हुआ। 
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बीएचयू के हिंदी विभाग के प्रो. सदानंद शाही - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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बीएचयू के हिंदी विभाग के प्रो. सदानंद शाही ने कहा कि कबीर और रैदास का काल ऐसा था जब ईश्वर और भक्त के बीच बिचौलियों की जमात ने जड़ें जमा ली थीं। अपने-अपने स्वार्थ के अनुरूप ईश्वर और धर्म की व्याख्या की जाने लगी थी। रैदास जिस बेगमपुरा को बसाना चाहते हैं कबीर अपना घर जलाकर उसी बेगमपुरा की आधारशिला रखने की बात करते हैं।

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बुधवार को रुद्राक्ष कन्वेंशन सेंटर में आयोजित तीन दिवसीय काशी उत्सव के दूसरे दिन परिचर्चा सत्र को संबोधित कर  प्रो. शाही ने कहा कि श्रम साधक संत कबीर और रैदास का लोक के साथ तादात्म्य अनूठा है।

बेगमपुरा की उनकी परिकल्पना में कोई दोयम नहीं है, सभी अव्वल हैं। कबीर ईंट-गारे से बने घर को नहीं बल्कि वैचारिकी के स्तर में मानव को छोटा साबित करने वाले घर को जला कर रैदास के बेगमपुरा का समर्थन करते हैं।
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कबीर के राम निराकार, तुलसी के राम साकार
कबीर गायक पद्मश्री भारती बंधु ने कहा कि एक बालिका ने मुझसे पूछा कबीर के राम और तुलसी के राम में क्या अंतर है। मुझे तत्काल कुछ नहीं सूझा। मुझे सामने एक बिजली का तार दिखा। मैंने बालिका से पूछा वह क्या है। उसने बताया तार है। मैंने पूछा उसके अंदर क्या है। उसने कहा ऊर्जा है। तब मैंने कहा बिजली का तार तुलसी के राम हैं जो साकार हैं। उस तार के अंदर की ऊर्जा दिखती नहीं, वह कबीर के राम हैं।
पढ़ेंः काशी उत्सव की दूसरी संध्या: मैथिली ठाकुर के सुरों पर झूमे काशीवासी, 'रुद्राक्ष' में बिखरे होली के रंग

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आचार्य रामानंद के शिष्य थे कबीर और रैदास

हिंदुस्तानी एकेडमी प्रयागराज के अध्यक्ष डॉ. यूपी सिंह - फोटो : अमर उजाला
हिंदुस्तानी एकेडमी प्रयागराज के अध्यक्ष डॉ. यूपी सिंह ने कहा कि मन चंगा तो कठौती में गंगा को भले ही रैदास से जोड़ दिया गया है, लेकिन यह साखी बाबा गोरखनाथ की है। वह संत रैदास से चार सौ वर्ष पूर्व आए थे। कबीर और रैदास दोनों ही आचार्य रामानंद के ही शिष्य थे। रामानंदाचार्य संस्कृत के साथ साथ हिंदी में भी लेखन करते थे। कालांतर में उनका प्रभाव इतना बढ़ा कि एक अलग संप्रदाय ही बन गया।
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