सिल्क कालीन में 44.81 तथा सिंथेटिक में 2.48 प्रतिशत की कमी
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जीएसटी का भारतीय कालीन के निर्यात पर बहुत गहरा असर पड़ा है। पिछले वित्तीय वर्ष के मुकाबले 2017-18 में भारतीय कालीन के निर्यात में 5.58 प्रतिशत गिरावट आई। वर्ष 2016-17 में हुए 9993.93 करोड़ के सापेक्ष 2017-18 में निर्यात आंकड़ा 9436.62 करोड़ तक ही पहुंच सका है।
कालीन निर्यात संवर्धन परिषद (सीईपीसी) के आंकड़ों के अनुसार जीएसटी लागू होने की वजह से सिल्क कालीन 44.81 प्रतिशत, हैंडनाटेड, हैंडटफ्टेड कालीनों और दरियों का बाजार 5.51 प्रतिशत और सिंथेटिक कालीन 2.48 प्रतिशत तक सिमट गया है। कहा जा रहा है कि सरकार ने ई-वे बिल में कालीन उद्यमियों को छूट नहीं दी तो आने वाले समय में हालात बिगड़ेंगे।
परिषद के अधिशासी निदेशक संजय कुमार ने बताया कि सिल्क कालीन महंगे होते हैं, जिनकी मांग मामूली है। इसकी आपूर्ति कश्मीर क्षेत्र से की जाती है। 2016-17 में कुल 66.48 करोड़ के सिल्क कालीन का निर्यात हुआ था, जो इस वर्ष घट कर 35.36 करोड़ रह गया।
वहीं, हैंडनाटेड, हैंडटफ्टेड और दरी आदि का निर्यात 9234.34 करोड़ का था, जो घट कर 8725.35 करोड़ पर आ गया है। इसी तरह सिंथेटिक कालीनों की मांग 693.11 करोड़ थी, जो 2.48 प्रतिशत घट कर 675.91 करोड़ पर आ गई। हर वर्ष परिषद निर्यात में 10 प्रतिशत बढ़ोतरी का लक्ष्य लेकर चलती है। इस लक्ष्य को पाना तो दूर, पिछले वर्ष के आंकड़े को भी कालीन निर्यात नहीं छू सका।
सीईपीसी चेयरमैन महावीर प्रताप उर्फ राजा शर्मा ने कहा कि जीएसटी लागू होने के बाद से कालीन उद्योग लड़खड़ा गया है। हम लोगों ने देशव्यापी बंद और प्रदर्शन किया तो सरकार ने कुछ राहत दी।