संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय की कार्य परिषद और विद्या परिषद को संस्कृत विद्यालय शिक्षक समिति के अध्यक्ष ने विधि विरुद्ध बताया है। अध्यक्ष डॉ. गणेश दत्त शास्त्री ने कहा कि उप्र राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम के मुताबिक दोनों परिषदों का गठन ही नहीं हुआ, ऐसे में इनके फैसले औचित्यहीन हैं। उन्होंने कुलपति को पत्र लिखकर दोनों परिषदों के नियमानुसार गठन की मांग की है।
प्रदेश अध्यक्ष ने बताया कि विद्या परिषद में महाविद्यालयों के तीन प्राचार्य वरिष्ठता के क्रम में, पंद्रह अध्यापक ज्येष्ठता क्रम में, चक्रानुक्रम से विश्वविद्यालय के चार उपाचार्य, चार प्राध्यापक, संबद्ध स्नातकोत्तर महाविद्यालय के चार अध्यापक जो प्राचार्य न हों एवं उपाधि महाविद्यालयों के तीन अध्यापक जो प्राचार्य ना हो, होने चाहिए। इसी तरह कार्य परिषद में दो संकायाध्यक्ष, अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों से संबंधित आचार्य या उपाचार्य, दो संकायाध्यक्ष से भिन्न विश्वविद्यालय का एक आचार्य, एक उपाचार्य, एक प्राध्यापक, संबद्ध महाविद्यालयों के प्राचार्य एवं एक अध्यापक, चार सदस्य सभा से चुने हुए तथा कुलाधिपति द्वारा नामित शिक्षा क्षेत्र के प्रतिष्ठित चार व्यक्ति विश्वविद्यालय एवं अनुसंधान संस्थान के निदेशक तथा पुस्तकालयाध्यक्ष, उप-शिक्षा निदेशक संस्कृत एवं आयुर्वेद महाविद्यालय के प्राचार्य को सदस्य बनाने का प्रावधान है। उन्होंने कहा कि विद्यापरिषद एवं कार्यपरिषद का विधिक रूप से गठन करने के उपरांत ही कोई प्रस्ताव पारित कराया जाना न्यायोचित एवं विधिक होगा। इस मुद्दे पर शाहजहांपुर से आए प्राचार्य डॉ. उमाकांत अग्निहोत्री, संस्कृत संरक्षण मंच के डॉ. साकेत शुक्ला, डॉ. गणेश गिरी, डॉ. श्रीशरंजन त्रिपाठी, डॉ. अवधेश तिवारी ने भी वार्ता की।