अड़भंगी शिव की नगरी काशी का हर रंग निराला है। बात जब होली की हो तब तो हर तन मन शिव रंग में रंगा नजर आता है। होलाष्टक के साथ ही शुरू होने वाले होली के हुड़दंग बुढ़वा मंगल तक हवा में होलियाना तरंग घोलते हैं। रंग, भंग और हंसी ठिठोली से रंगी पगी होली को देखने के लिए देश ही नहीं विदेशों से भी सैलानी बनारस आते हैं।
उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष पद्मश्री प्रो. राजेश्वर आचार्य का कहना है कि होली में शरीर ही नहीं मन भी तरंगित हो उठता है। हर तरफ बस इंद्रधनुषी अहसास होता है। मुस्कराहट के साथ रस से भरी गाली और मर्यादित हुल्लड़बाजी बनारस में ही संभव है। यहां होली में हंसी-ठिठोली के साथ गाली दुर्भावना नहीं, अपनत्व को दर्शाती है। शिव की नगरी में होली का एक अलग ही रंग नजर आता है। यहां नाथ से, भस्म से, भभूत से, रेत से और प्रेत से होली खेली जाती है। रंग-भंग, गारी और लोक संगीत की जुगलबंदी वाले शहर की होली का आकर्षण हर किसी को बांध ही लेता है। होली ही एक ऐसा त्योहार जब लोग खुलकर मिलते हैं। गाली देकर भी प्रसन्न करने की अभिलाषा होती है।
अब नहीं गूंजती है फगुआ, चहका और चौताला की धुन
प्रख्यात साहित्यकार प्रो. जितेंद्रनाथ मिश्र कहते हैं कि बनारस की होली भी बनारसी रंग-ढंग में रंगी होती है। अपने जमाने की याद करते हुए प्रो. मिश्र ने बताया कि होली में फूहड़ता के लिए कोई जगह नहीं थी। शहर में अब तो बहुत कुछ बदल गया है। अब फगुआ, चहका, बेलवइया और चौताला की धुन सुनने को नहीं मिलती है। रंगोत्सव की शाम से चैता का गायन शुरू होता था। बनारस में कसेरा जाति के लोग खमसा गाया करते थे। अब तो खमसा सुनने के लिए कान तरस जाते हैं। चौताला, चहका, बेलवईया, फगुआ भी गायब हो गया है। दशाश्वमेध के डेढ़सी पुल पर साहित्यकारों की अड़ी का नजारा ही अद्भुत होता था। उस दौरान बेढब बनारसी, भैयाजी बनारसी, बेधड़क बनारसी की मौजूदगी आयोजन को और खास बना देती थी।