कबीरदास जैसे कवियों का भारत में जन्म लेना गौरव की बात है। कबीर दास जी ने अपने काव्य के जरिए समाज में फैली कुरीतियों को दूर किया है। इसके साथ ही सामाजिक भेदभाव और आर्थिक शोषण का विरोध किया है।
महान विद्वान कवि कबीरदास जी ने अपने जीवन में किसी तरह की शिक्षा नहीं ली थी। लेकिन उन्होंने अपने जीवन के अनुभवों, कल्पना शक्ति और अध्यात्म कल्पना शक्ति के बल पर पूरी दुनिया को वो ज्ञान दिया। जिसे अमल कर कोई भी व्यक्ति अपने जीवन में सफलता हासिल कर सकता है।
उन्होंने अपने विचारों से लोगों को प्रेम की परिभाषा सिखाई एवं उनके मन में सकारात्मक भाव पैदा किए। वे हिन्दी साहित्य के महिमामंडित व्यक्तित्व थे जिन्होंने न सिर्फ अपनी रचनाओं के माध्यम से हिन्दी साहित्य को समृद्ध बनाया बल्कि समाज में फैली तमाम कुरीतियों को
दूर करने के अथक प्रयास किए।
हिन्दी साहित्य में उनके अतुलनीय योगदान को कभी नहीं भुलाया जा सकता है। उनका कहा गया किसी भी तुलना से ऊपर और प्रेरणादायक है।
हिंदी साहित्य में नहीं हुआ कबीर से बड़ा मानवतावादी
सच्चे गुरु की प्रशंसा से गुंजायमान लघु और सहज तरीकों से कविताओं को उन्होंने बनाया था। अनपढ़ होने के बावजूद भी उन्होंने अवधी, ब्रज और भोजपुरी के साथ हिन्दी में अपनी कविताएं लिखी थी। कबीर के द्वारा रचित सभी कविताएं और गीत कई सारी भाषाओं में मौजूद हैं। डॉ. पारसनाथ तिवारी लिखते हैं।
सच्ची बात यह है कि हिन्दी साहित्य में कबीर से बड़ा मानवतावादी कोई नहीं हुआ। उन्होंने तत्कालीन भारतीय समाज में प्रचलित समस्त अंधविश्वासों, रूढिय़ों तथा मिथ्या सिद्धान्तों द्वारा प्रचारित सामाजिक विषमताओं का मूलोच्छेद करने का बीड़ा उठाया और निर्भयता पूर्वक पाखंडों पर प्रहार किया।
बोलचाल की भाषा का किया प्रयोग
कबीरदास ने बोलचाल की भाषा का ही प्रयोग किया है। भाषा पर कबीर का जबरदस्त अधिकार था। वे वाणी के डिक्टेटर थे। जिस बात को उन्होंने जिस रूप में प्रकट करना चाहा है, उसे उसी रूप में कहलवा लिया।