आचार्य हजारी प्रसाद ने हस्तलेखों की खोज से हिंदी साहित्य व भाषा को नई दिशा प्रदान की, लेकिन आज हस्तलिखित ग्रंथ धूल फांक रहे हैं। नागरी प्रचारिणी के जिन कमरों में बैठकर आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने हिंदी ग्रंथों की रचना की, वह आज बदहाल स्थिति में हैं। न तो हिंदी साहित्य का अब सृजन होता है और न ही पत्रिकाओं का प्रकाशन। 19 मई को उनकी पुण्यतिथि मनाई जाएगी।
बुधवार दोपहर एक बजे अमर उजाला की टीम नागरी प्रचारिणी सभा पहुंची तो वहां ताला लटक रहा था। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की रचनाओं को खोजते हुए जब पुस्तकालय में पहुंचे तो वहां भी सन्नाटा पसरा था। किताबों की आलमारी और पांडुलिपियों के ऊपर धूल की परत जमी थी। नागरी प्रचारिणी सभा के सहायक मंत्री सभापति शुक्ल ने बताया कि काशी के हस्तलेखों की खोज में निरीक्षक की अहम भूमिका आचार्य द्विवेदी ने निभाई थी। खोज विभाग के निर्देशक तथा पत्रिका के संपादक के तौर पर उन्होंने हिंदी साहित्य के उन्नयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके दौर में हिंदी हस्तलेख के कई महत्वपूर्ण दस्तावेज की खोज हुई और उन्हें एक जगह समाहित किया गया। वर्तमान में हस्तलेखों की खराब स्थिति पर सहायक मंत्री ने कहा कि इनके रखरखाव के लिए कई बार प्रयास किया गया है, कर्मचारियों की कमी होने के कारण स्थितियां बदहाल हैं।