अखिलेश यादव ने पीपल के पेड़ के नीचे पत्थर रखने संबंधी बयान देकर लोगों की धार्मिक भावनाओं को आहत किया। असदुद्दीन ओवैसी व उनके भाई ने हिंदुओं के धार्मिक मामलों पर और स्वयंभू लार्ड विश्वेश्वर के खिलाफ लगातार अपमानजनक बातें कीं। इस मामले में पुलिस आयुक्त को तहरीर देकर मुकदमा दर्ज करने की मांग की गई।
मुकदमा दर्ज नहीं होने पर अदालत में वाद दायर किया गया। आरोप लगाया गया कि पूरे मामले पर साजिश में अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमेटी, शहर काजी, शहर के उलेमा आदि शामिल हैं। न्यायालय में दायर वाद में ओवैसी और अखिलेश यादव सहित सात नामजद और 2000 अज्ञात के खिलाफ धार्मिक भावनाओं को आहत करने के आरोप में मुकदमा दर्ज कर विवेचना की मांग की गई है।
ज्ञानवापी में मुस्लिमों के प्रवेश पर रोक और मस्जिद हटा कर जमीन का कब्जा देने को लेकर दाखिल वाद सुनवाई योग्य है या नहीं, इस पर शनिवार को सुनवाई पूरी हो गई। सिविल जज सीनियर डिवीजन महेंद्र कुमार पांडेय की फास्ट ट्रैक कोर्ट में सभी पक्षों की दलीलें पूरी कर ली गईं। कोर्ट ने आदेश के लिए 27 अक्तूबर की तिथि तय की। अधलात ने कहा कि 18 अक्तूबर तक तक सभी पक्ष अपनी लिखित बहस दाखिल करे।
सिविल कोर्ट को इस मामले को सुनने का अधिकार नहीं
बीते बुधवार को हुई सुनवाई में अंजुमन पक्ष की ओर से अधिवक्ता रईस अहमद व एखलाक अहमद आदि ने दलील में कहा था कि इस वाद में प्रॉपर्टी ऑफ डिस्प्यूट स्पष्ट नहीं है। वाद लाने का क्या कारण है, यह भी नहीं बताया गया। पक्षकार कैसे प्रभावित हैं, यह भी स्पष्ट नहीं है।
उन्होंने कहा कहा था कि आदि विश्वेश्वर नाम के देवता हैं ही नहीं, जबकि वाद आदि विश्वेश्वर भगवान विराजमान व किरन सिंह पांच अन्य की तरफ से दाखिल किया गया। वाद में विवादित सम्पत्ति को मस्जिद बताया गया है जो वर्ष 1669 की बताई गई है। मस्जिद वक्फ की सम्पत्ति है और यह सम्पत्ति सेंट्रल सुन्नी वक्फ बोर्ड में दर्ज है और उसको पक्षकार ही नहीं बनाया गया है। सम्पत्ति वक्फ बोर्ड की है, ऐसे में सिविल कोर्ट को इसको सुनने का अधिकार नहीं है।