पिछले 15 दिन में वाराणसी जिले में चार ट्रेनें दुर्घटनाग्रस्त होने से बाल-बाल बचीं। कोई रेल ट्रैक पर रॉड छोड़ गया तो कोई बाइक। चालकों की सूझबूझ से बड़े हादसे तो बच गए मगर रेल ट्रैक की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े हो रहे हैं। इन घटनाओं के लिए जिम्मेदार लोगों की पहचान करने तक पर गंभीरता से काम नहीं हुआ। वरिष्ठ अधिकारियों ने इसे हल्का मामला बता पल्ला झाड़ लिया तो वहीं, आरपीएफ मुकदमा दर्ज कर खानापूर्ति तक ही सीमित है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र और रेल राज्य मंत्री मनोज सिन्हा के पड़ोसी जिले बनारस में रेल सुरक्षा के साथ मनमानी हो रही है। यह आलम तब है जब पूर्वोत्तर रेलवे वाराणसी मंडल के डीआरएम और उत्तर रेलवे वाराणसी के एडीआरएम जैसे वरिष्ठ अधिकारी यहां बैठते हैं।
अक्तूबर के पहले हफ्ते में बनारस से नई दिल्ली जाने वाली सबसे महत्वपूर्ण ट्रेन शिवगंगा के इंजन में ओएचई का तार लिपट गया था। इसके बाद मंडुवाडीह नई दिल्ली सुपरफास्ट, गोरखपुर-पुणे, सुल्तानपुर पैसेंजर और मरुधर एक्सप्रेस के साथ घटनाएं घटी। सभी घटनाओं में लोको पायलट की सतर्कता महत्वपूर्ण रही, जिससे बड़ा हादसा नहीं हुआ।
हालांकि सभी घटनाओं के दौरान ट्रेनों का परिचालन प्रभावित हुआ, यात्रियों को समस्या हुई सो अलग। घटनाओं में काफी कुछ समानता भी देखने को मिली। जहां मंडुवाडीह-नई दिल्ली सुपरफास्ट और गोरखपुर-पुणे एक्सप्रेस में ट्रैक पर बूम लॉकर व रॉड आदि रख दिए गए थे।
वहीं, सुल्तानपुर पैसेंजर और मरुधर एक्सप्रेस के सामने अज्ञात चालक बाइक छोड़कर भाग गए। इतना ही नहीं दोनों बाइक के नंबर (यूपी 66 एच3828) और (यूपी 66 एच 3895) में भी काफी समानता है। इसे लेकर किसी बड़ी साजिश से भी इंकार नहीं किया जा सकता।