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Varanasi: मरीजों की सेवा में भूल जाते हैं खुद का दर्द, संवाद में 'धरती के भगवान' ने साझा की मन की बात

Sun, 02 Jul 2023 11:18 PM IST
उत्पल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी

सार

डॉक्टर ऐसे ही धरती के भगवान नहीं कहे जाते हैं। वे इंसान की जिन्दगी बचाने के लिए हर कोशिश करते हैं। आज जानिए वाराणसी के कुछ ऐसे डॉक्टरों के बारे में।  
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डॉक्टर्स डे पर अमर उजाला कार्यालय में विशेष संवाद - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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डॉक्टर ऐसे ही धरती के भगवान नहीं कहे जाते हैं। वे इंसान की जिन्दगी बचाने के लिए हर कोशिश करते हैं। मरीजों की सेवा, साधना में लगे डॉक्टरों को बस केवल एक ही चिंता रहती है कि उनका मरीज जल्द से जल्द स्वस्थ हो जाए। इसके लिए वो खुद का दर्द भी भूल जाते हैं।

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डॉक्टर्स डे के मौके पर अमर उजाला कार्यालय में आयोजित विशेष संवाद में डॉक्टरों ने कुछ इसी तरह मन की बात को लोगों से साझा किया। उनका कहना था कि एक ओर मरीजों की सेवा, दूसरी ओर घर परिवार के साथ भी समय व्यतीत करना जरूरी होता है। ऐसे में कभी कभी कठोर निर्णय भी लेने पड़ते हैं।
ये भी पढ़ें: अमर उजाला संवाद में बनारस के जाने-माने डॉक्टरों ने रखी बेबाक राय, बीमारियों से निजात पाने पर चर्चा

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बच्चों के लिए छोड़ दी सरकारी नौकरी

डॉ. प्रीतम और डॉ. शम्मी चंद्रा - फोटो : अमर उजाला
दंत चिकित्सक डॉ. शम्मी चंद्रा ने अपने जीवन के संघर्षों की कहानी बताई। कहा कि जब एक ही परिवार में पति-पत्नी दोनों डॉक्टर हो तो फिर दोहरी चिंता रहती है। एक ओर मरीज की बेहतर सेवा तो दूसरे घर पर रहने वाले बच्चों की देखभाल सही हो जाए। डॉ. शम्मी ने बताया कि एक समय ऐसा आया कि सरकारी नौकरी छोड़नी पड़ी। अब किसी तरह निजी क्लीनिक चला रहे हैं। संवाद में मौजूद उनके पति और बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रीतम ने भी डॉ. शम्मी के त्याग की सराहना की।

इमरजेंसी में रहती है बच्चे के सेहत की चिंता

डॉ. रजनी चौरसिया और डॉ. कुमार आशीष - फोटो : अमर उजाला
न्यूरो सर्जन डॉ. कुमार आशीष और स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. रजनी चौरसिया ने भी अपने जीवन में संघर्षों को साझा किया। कहा कि कभी कभी तो ऐसा होता है कि दोनों लोगों को इमरजेंसी में अस्पताल जाना पड़ता है। ऐसे में बच्चों के सेहत की चिंता रहती है। अगर डॉ. रजनी को किसी दिन पहले अस्पताल चली जाती है और मुझे भी इमरजेंसी में जाना पड़ा तो बच्चों को उन्हीं के अस्पताल में छोड़कर मरीज की सेवा करने निकल जाते हैं।

ढाई घंटे तक सीपीआर देकर बचा ली प्रोफेसर की जान

बीएचयू हृदय रोग विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. ओमशंकर - फोटो : अमर उजाला
संवाद में मौजूद बीएचयू हृदय रोग विशेषज्ञ प्रो.ओमशंकर ने ऐसी कहानी बताई, जिसे सुनकर सभी ने उनका तालियों की गड़गड़ाहट से स्वागत किया। प्रो. ओमशंकर ने बताया कि बीएचयू के एक डॉक्टर को करीब पांच साल पहले हार्ट अटैक आय था। अस्पताल पहुंचते ही कार्डियक अरेस्ट भी हो गया। उस दिन ओटी में कैथ लैब की मशीन खराब होने की वजह से मैं बाहर आ गया। सीसीयू में मरीज देखने गया तो देखा कि स्ट्रेचर पर एक व्यक्ति दर्द से छटपटा रहा है। नजदीक पहुंचने पर पता चला कि वो तो आईएमएस के ही प्रोफेसर हैं।
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जैसे ही नजरें मिली स्ट्रेचर पर लेटे प्रोफेसर ने मेरा नाम लेते कहा कि अब मैं बच जाउंगा। एक चिकित्सक के रूप में मेरे लिए इससे बड़ा विश्वास और कुछ नहीं था। इतने में प्रोफेसर को कार्डियक अरेस्ट हो गया। सांस लेना बंद हो गया था। इसके बाद हमने सीपीआर देना शुरू किया । शायद किसी चिकित्सक के जीवन में यह पहला अवसर रहा होगा जब किसी मरीज को ढाई घंटे तक लगातार सीपीआर के साथ ही 60 से अधिक बिजली के झटके देने पड़े। उसके बाद अन्य जरूरी उपचार भी हुए। लिहाजा प्रोफेसर की जान बचाने में कामयाबी मिली। अब प्रोफेसर स्वस्थ हैं और समाज में खुशिया बांट रहे हैं।
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