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पुण्यतिथि आज: आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने तोड़ी हिंदी पाठ्यक्रम की परंपरा, शामिल कराए नए अध्याय

Thu, 19 May 2022 12:39 PM IST
वाराणसी ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी

सार

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी साक्षात ज्ञान के हजारा थे, जिन्होंने हिंदी साहित्य जगत को अपने ज्ञान की फुहारों से अभिसिंचित किया। केदारनाथ सिंह, नामवर सिंह, काशीनाथ सिंह, शिव प्रसाद सिंह और विश्वनाथ त्रिपाठी जैसे मूर्धन्य साहित्यकारों ने आचार्य द्विवेदी के सानिध्य व निर्देशन में हिंदी की यात्रा को अनवरत बनाए रखा। 
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हजारी प्रसाद द्विवेदी (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का नागरी प्रचारिणी सभा के साथ ही बीएचयू का कार्यकाल किसी स्वर्णयुग से कम नहीं था। बीएचयू के हिंदी विभाग में लंबे समय से चली आ रही पाठ्यक्रम परंपरा को तोड़कर कई नए अध्याय को उन्होंने शामिल कराया। एमए के पाठ्यक्रम में निराला की कविता तुलसीदास और स्नातक के पाठ्यक्रम में प्रेमचंद को जोड़कर हिंदी साहित्य को विस्तार दिया।

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नागरी प्रचारिणी सभा के सहायक मंत्री सभापति शुक्ल ने बताया कि उनके नामकरण का वाकया बेहद दिलचस्प है। आचार्य द्विवेदी के पिता पं. अनमोल द्विवेदी कर्मकांडी ब्राह्मण थे और वह एक दिन पूजन के लिए गए तो उन्हें दक्षिणा में हजार रुपये मिले थे। वह बेहद प्रसन्नता के साथ जब घर आए तो पता चला कि बेटा हुआ है। उन्हें दोगुनी प्रसन्नता हुई और उन्होंने पुत्र का नाम ही हजारी प्रसाद रख दिया।

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी साक्षात ज्ञान के हजारा थे, जिन्होंने हिंदी साहित्य जगत को अपने ज्ञान की फुहारों से अभिसिंचित किया। केदारनाथ सिंह, नामवर सिंह, काशीनाथ सिंह, शिव प्रसाद सिंह और विश्वनाथ त्रिपाठी जैसे मूर्धन्य साहित्यकारों ने आचार्य द्विवेदी के सानिध्य व निर्देशन में हिंदी की यात्रा को अनवरत बनाए रखा।

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बीएचयू से था गहरा लगाव

आचार्य द्विवेदी 1923 में बनारस आए और कमच्छा स्थित रणवीर संस्कृत विद्यालय में उनका दाखिला हुआ। 1930 में बीएचयू से उन्हें ज्योतिष विषय में आचार्य की उपाधि मिली। इसी दौरान उनकी मुलाकात महामना मदन मोहन मालवीय से हुई थी।

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी (जन्म - 19 अगस्त, 1907, बलिया, निधन - 19 मई, 1979, दिल्ली)
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हजारी प्रसाद ने खोजे थे हस्तलेख, आज फांक रहे हैं धूल

आचार्य हजारी प्रसाद ने हस्तलेखों की खोज से हिंदी साहित्य व भाषा को नई दिशा प्रदान की, लेकिन आज हस्तलिखित ग्रंथ धूल फांक रहे हैं। नागरी प्रचारिणी के जिन कमरों में बैठकर आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने हिंदी ग्रंथों की रचना की, वह आज बदहाल स्थिति में हैं। न तो हिंदी साहित्य का अब सृजन होता है और न ही पत्रिकाओं का प्रकाशन।

बुधवार दोपहर एक बजे अमर उजाला की टीम नागरी प्रचारिणी सभा पहुंची तो वहां ताला लटक रहा था। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की रचनाओं को खोजते हुए जब पुस्तकालय में पहुंचे तो वहां भी सन्नाटा पसरा था। किताबों की आलमारी और पांडुलिपियों के ऊपर धूल की परत जमी थी।

नागरी प्रचारिणी सभा के सहायक मंत्री सभापति शुक्ल ने बताया कि काशी के हस्तलेखों की खोज में निरीक्षक की अहम भूमिका आचार्य द्विवेदी ने निभाई थी। खोज विभाग के निर्देशक तथा पत्रिका के संपादक के तौर पर उन्होंने हिंदी साहित्य के उन्नयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके दौर में हिंदी हस्तलेख के कई महत्वपूर्ण दस्तावेज की खोज हुई और उन्हें एक जगह समाहित किया गया। वर्तमान में हस्तलेखों की खराब स्थिति पर सहायक मंत्री ने कहा कि इनके रखरखाव के लिए कई बार प्रयास किया गया है, कर्मचारियों की कमी होने के कारण स्थितियां बदहाल हैं।
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