वाराणसी। अब गंगा किनारे किसान वैज्ञानिक तरीके से जैविक खेती करना सीखेंगेे। पहली बार भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान (आईआईवीआर) के वैज्ञानिकों ने गंगा किनारे खेती पर शोध शुरू कर दिया है। इसके तहत आराजीलाइन ब्लाक में गंगा किनारे 10 प्रकार की उन्नत किस्म की सब्जियों की फसल लगाई है। बेहतर परिणाम के बाद इस तकनीक को देश भर में नदियों के किनारे बसे किसानों तक पहुंचाया जाएगा।
अक्तूबर के बाद गंगा किनारे किसान पुरानी परंपरा के अनुसार सब्जियों की खेती करते आ रहे हैं। जिसमें कुछ किसान रसायन विधि से तो कुछ किसान मिश्रित (रसायन और जैविक खाद) खेती कर रहे हैं। बजट 2022-23 में जैविक खेती पर जोर देने के बाद आईआईवीआर ने शोध शुरू कर दिया है। गंगा किनारे बसे किसानों को रसायन मुक्त खेती और गंगा के जल की शुद्धता बनाए रखने के लिए पूर्ण रुप से जैविक विधि से कोहड़ा, करेला, नेनूआ, लौकी, तोरई, टमाटर, तरबूज सहित कई प्रकार की कद्दू वर्गीय फसलों को बिना रसायनिक खाद के एक एकड़ में प्रायोगिक तौर पर लगाया गया।
संस्थान के निदेशक डॉ. तुषार कांति बेहेरा ने बताया कि किसानों की आय दो गुनी करने और गंगा जल की शुद्धता बनाए रखने के उद्देश्य से संस्थान के वैज्ञानिकों ने पहली बार सब्जियों की कई किस्मों को लगाया है। इसमें हाइब्रिड और हाइब्रिड मुक्त बीजों को तुलनात्मक परिणाम के लिए शामिल किया गया। शोध परंपरागत सब्जियों के मुकाबले अधिक उत्पादन, पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ाने, पौधों के विकास और उत्पादन क्षमता की जांच की जाएगी। तीन माह के परिणाम में सब्जियों के विकास के परिणाम अच्छे हैं। इसकी सफलता के बाद इस तकनीक को पूरे देश में नदियों के किनारे बसे किसानों तक पहुंचाया जाएगा।
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गंगा की रेत में लगाया ग्राफ्टेड टमाटर
संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ सुधाकर पांडेय ने बताया कि इस प्रयोग में पहली बार गंगा किनारे रेत में 200 पौधे ग्राफ्टेड टमाटर (बैगन की जड़ पर टमाटर की कलम) की रोपाई की गई है। सामान्य खेतों में अभी तक ग्राफ्टेड टमाटर का उत्पादन 30-40 किलो प्रति पौधा रहा है। इस शोध में इसके उत्पादन को देखा जाएगा।