तीन सौ साल पहले हुई थी धनवंतरि जयंती की शुरूआत
राजवैद्य पं. शिव कुमार शास्त्री का परिवार पांच पीढिय़ों से भगवान धनवंतरि की सेवा कर रहा है। पं. रामकुमार शास्त्री ने बताया कि उनके पूर्वज पं. बाबूनंदन जी ने तीन सौ साल पहले धनवंतरि जयंती की शुरूआत की थी। यह परंपरा आज भी जारी है।
सुडिय़ा स्थित धनवंतरि भवन में भगवान धनवंतरि की प्रतिमा धनतेरस पर आमजनों के दर्शन के लिए खोली जाती है। रजत सिंहासन पर करीब ढाई फीट ऊंची रत्न जडि़त मूर्ति साक्षात अद्भुत है। एक हाथ में अमृत कलश, दूसरे में शंख, तीसरे में चक्र और चौथे हाथ में जोंक तो दोनों ओर चंवर डोलाती सेविकाएं। दिव्य झांकी के दर्शन कर भक्त वर्ष भर आरोग्य की कामना करते हैं।
मान्यता है कि प्रभु धनवंतरि के दर्शन से वर्ष भर परिवार में रोग-व्याधि नहीं होती है। श्रीमद्भागवत में उल्लेख है कि विष्णु के 24 अवतारों में धनवंतरि भी एक थे। वह सीधे समुद्र से हाथ में अमृत कलश लेकर प्रगट हुए थे। यह काल दोपहर का था ऐसे में पूजन इस बेला में ही किया जाता है।