श्रावण पूर्णिमा के दिन खंडग्रास चंद्रग्रहण के चलते मध्याह्न काल से ही मंदिरों के कपाट बंद हो जाएंगे। लेकिन बाबा विश्वनाथ का गर्भगृह शाम 4:30 बजे बंद किया जाएगा। इस दौरान दरबार में दौरान जलाभिषेक भी नहीं होगा।
शृंगार भोग आरती के पर्यवेक्षक प्रो. बाल शास्त्री ने शास्त्र सम्मत वैदिक परंपरा का पालन कराने के लिए सूतक काल में विश्वनाथ मंदिर के कपाट बंद रखने की सलाह दी है। परंपरा के अनुसार ग्रहण के सूतक काल में मंदिरों के पट बंद रखे जाते हैं।
सावन के आखिरी सोमवार यानी सात अगस्त की रात 10:52 बजे लगेगा। खंडग्रास चंद्रग्रहण के नौ घंटे पूर्व दोपहर 1:52 बजे सूतक लग जाएगा। ऐसे में शास्त्र सम्मत काशी के प्रमुख मंदिरों के कपाट मध्याह्न काल में ही बंद कर दिए जाएंगे। लेकिन बाबा विश्वनाथ के कपाट 4:30 बजे बंद होंगे।
ऐसा पूर्व में मंदिर प्रशासन की ओर से ऐसे अवसरों पर लिए गए निर्णयों की पत्रावलियों के अध्ययन के आधार पर किया जा रहा है। ऐसे में सूतक काल के बावजूद विश्वनाथ मंदिर में सप्तर्षि आरती 2:30 से 3:30 बजे तक और शृंगार भोग आरती 3:30 से चार बजे तक होगी। जबकि उस दिन मंगला आरती अपने निर्धारित समय पर रात 2:45 बजे से ही होगी।
गुरुवार की शाम सीईओ ने श्रावण पूर्णिमा के दिन 4:30 बजे से बाबा के कपाट बंद करने का निर्देश जारी किया। उधर, शृंगार, भोग आरती के पर्यवेक्षक प्रो. बाल शास्त्री ने न्यास परिषद के अध्यक्ष आचार्य पं. अशोक द्विवेदी, मंडलायुक्त नितिन रमेश गोकर्ण, सीईओ एसएन त्रिपाठी को खंडग्रास चंद्रग्रहण लगने पर परंपरा के पालन के लिए पत्र भेजा है।
आरती के पर्यवेक्षक ने मंदिर प्रशासन को सलाह दी है कि ग्रहण काल में मूर्ति स्पर्श न करने की अति प्राचीन परंपरा है। ऐसे में परंपरा के अनुसार काशी विश्वनाथ मंदिर के कपाट को बंद रखना उचित होगा।
पर्यवेक्षक ने एक तरफ तो कपाट बंद रखने की सलाह दी है, दूसरी ओर रात्रि भोग आरती में बाबा को फलाहार, कुटू की खीर का भोग लगाने के लिए भी कहा है, जबकि सूतक काल में भोजन, शयन वर्जित है।
न्यास परिषद के अध्यक्ष आचार्य पं. अशोक द्विवेदी ने कहा है कि परंपराओं का कड़ाई से पालन कराया जाना चाहिए। सूतक काल में न तो जलाभिषेक होना चाहिए न तो आरती और स्पर्श। ऐसे में कपाट बंद रखा जाना चाहिए।