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परिवर्तन का सम्मान जरूरी, खुद से हो बदलाव की शुरुआत : दलाई लामा

Tue, 02 Jan 2018 02:11 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
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दलाई लामा - फोटो : अमर उजाला
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तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा ने सोमवार को केंद्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान के स्वर्ण जयंती समारोह का उद्घाटन करते हुए छात्रों को नव वर्ष की शुभकामनाएं दीं। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि इस नए क्षण और नए अवसर को ग्रहण करते हुए अपनी प्राथमिकताएं तय करें।
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हमें हर परिवर्तन का सम्मान करना चाहिए। वर्तमान समय की आवश्यकता है कि बदलते समय के साथ हम स्वयं को उद्देश्यपूर्ण तरीके से ढालें। हमें प्राप्त होने वाला प्रत्येक क्षण नवीन है।

इसका उपयोग नए तरीके से स्वयं तथा मानवता के हित में करना चाहिए। छात्र अपने भीतर बहुआयामी दृष्टिकोण का विकास करें। संस्थान के स्वर्ण जयंती समारोह के उद्घाटन के बाद तिब्बती धर्मगुरु ने कहा कि आने वाले वर्ष में कुछ ऐसा काम करें कि जब पीछे मुड़कर देखें तो लगे कि कुछ अच्छा किया है।
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अगर ऐसा नहीं है तो हमें बदलाव की जरूरत है। बदलाव की शुरुआत स्वयं से करनी चाहिए। तभी बेहतर परिवार और समाज की परिकल्पना साकार होगी। हमें अपने मस्तिष्क को सतत क्रियाशील रखना चाहिए।

इस दौरान दलाई लामा ने संस्थान की स्वर्ण जयंती पर स्मारिका तथा संस्थान द्वारा प्रकाशित 22 ग्रंथों का विमोचन किया। संस्थान के पुरा छात्र संगठन द्वारा सेवानिवृत्त शिक्षकों को सम्मानित भी किया गया।

समारोह में सिक्किम के पूर्व उप राज्यपाल डॉ. बीपी सिंह ने कहा कि शांति की स्थापना हमारे प्रयासों से ही संभव है। कुलपति प्रो. गेशे नवांग समतेन ने संस्थान की उपलब्धियों के बारे में जानकारी दी। कुलसचिव डॉ. आरके उपाध्याय ने धन्यवाद ज्ञापन किया।

नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने के लिए बजाते हैं ‘ताली’

केंद्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान में दलाई लामा - फोटो : अमर उजाला

संस्थान की स्वर्ण जयंती पर तालियों की गड़गड़ाहट के साथ विद्वतजनों का सम्मान किया गया। इस पर दलाई लामा ने चुटकी ली। उन्होंने कहा कि समारोह में कई बार तालियां बजाई गईं जबकि तिब्बत में इन तालियों का मतलब ठीक उल्टा है।

वहां किसी भी नकारात्मक चीज को अपने से दूर करने के लिए तालियां बजाई जाती हैं। इस पर उन्होंने दो वाकिये भी साझा किए। बताया कि 1956 में चीन का प्रतिनिधिमंडल तिब्बत के गांव में गया था।

उस चीनी प्रतिनिधिमंडल के विरोध में ग्रामीणों ने तालियां बजानी शुरू कर दी थी। इसी तरह 1940 में जर्मनी के कुछ लोग ल्हासा गए थे। वहां के लोगों ने उन्हें एलियन समझा और उन्हें दूर भगाने के लिए तालियां बजाने लगे जबकि जर्मन प्रतिनिधिमंडल को ये लगा कि वे उनका अभिवादन कर रहे हैं।

भारत को शीर्ष पर देखना चाहते हैं पीएम मोदी

अशिर्वाद देते दलाई लामा - फोटो : अमर उजाला
केंद्रीय तिब्बती प्रशासन के प्रमुख डॉ. लोकसंग सेंग्ये ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत को शीर्ष पर देखना चाहते हैं। इस लिहाज से भारत को अपने प्राचीन ज्ञान को पुनर्जीवित करना होगा।

आज जब भारत मेक इन इंडिया की ओर से बढ़ रहा है, ये सही मौका है जब भारत को अपने स्वर्णिम अतीत को साथ लेकर बौद्ध धर्म के रूप में अपने व्यापक स्वरूप पर विचार करना होगा।

दुनिया आज भी भारत की ओर देख रही है। ये भारतीय ज्ञान की ही देन है कि पश्चिम जो अब तक मस्तिष्क की बात करता था, आज आत्मा और मन की बात कर रहा है। उन्हाेंने कहा कि संस्थान में ये क्षमता है कि वह भारत की नालंदा ज्ञान परंपरा की पुनर्स्थापना कर विश्व में बौद्ध धर्म के मूल संदेशों का प्रसार करे।
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देश भर में खुलेंगी तिब्बत संस्थान की शाखाएं 

बोध गया के लिए रवाना होते दलाई लामा - फोटो : अमर उजाला
संस्थान के कुलपति प्रो. गेशे नवांग समतेन ने कहा कि दलाई लामा और पं. नेहरू के प्रयास से 50 साल पहले जिस संस्थान की परिकल्पना की गई वो आज विशाल वट वृक्ष बन गया है। अब इस वृक्ष की शाखाएं देश भर में बांहें फैलाने को तैयार हैं।

उन्होंने कहा कि हम देश भर में संस्थान की शाखाएं खोलने जा रहे हैं जहां सिर्फ तिब्बती या हिमालयन क्षेत्र के छात्र-छात्राओं को ही नहीं बल्कि भारतीयों और विदेशी छात्र-छात्राओं को बौद्ध दर्शन पढ़ने समझने का मौका मिलेगा।

प्रो. समतेन ने बताया कि संस्थान बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पहल पर बिहार सरकार के साथ बौद्ध दर्शन, खास तौर पर राहुल सांस्कृत्यायन की कृतियों का अनुवाद कर रहा है। संस्थान में शिक्षा शास्त्र संकाय शुरू करने की भी पहल की जा रही है। इसका प्रस्ताव बनाकर यूजीसी को भेजा गया है। 
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