संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में प्रोफेसर पद पर फर्जीवाड़ा के जरिए नियुक्ति का खुलासा हुआ है। जिसके पास प्राध्यापक बनने तक की योग्यता नहीं थी, उसे न केवल तैनाती दी गई, बल्कि प्रोफेसर पद पर प्रोन्नति भी दे दी गई।
मामले में अब तक 73.83 लाख रुपये की वित्तीय अनियमितता पर प्रदेश के महालेखा परीक्षक (एजी) की रिपोर्ट को भी दबा दिया गया। वेतन मद में हुए भुगतान पर वित्त अधिकारी को पत्र लिखकर एजी ने जब आपत्ति जताई, तब कुलपति ने उसी प्रोफेसर को वित्त अधिकारी का अतिरिक्त प्रभार दे दिया। एजी की रिपोर्ट शासन तक पहुंच गई है।
एजी की रिपोर्ट बताती है कि विश्वविद्यालय में कार्यरत डॉ. प्रेमनारायण सिंह की सेवा पुस्तिका एवं व्यक्तिगत पत्रावली के अनुसार उनकी शिक्षा शास्त्र विभाग के आचार्य पद पर नियुक्ति 2 अप्रैल, 2001 को की गई थी।
राज्यपाल को शिकायत भेजकर सुग्रीव मिश्रा ने कहा कि विश्वविद्यालय में प्राध्यापक पद के लिए नियमानुसार स्नातक में 50 प्रतिशत और बीएड में 55 प्रतिशत अंक होने चाहिए।
डॉ. प्रेमनारायण सिंह के बीएड में 53 प्रतिशत और स्नातक (शास्त्री) में 49.7 प्रतिशत अंक हैं। नियुक्ति नियम विरुद्ध, कूटरचित अभिलेखों के आधार पर की गई है। एजी की रिपोर्ट में कहा गया है कि कुलसचिव ने एक शिकायती पत्र के आधार पर प्रेम नारायण सिंह की शैक्षणिक योग्यता संबंधी अभिलेखीय साक्ष्य मांगे थे।