जर्मन वैज्ञानिको के अध्ययन में यह बात सामने आई थी कि यह डीएनए सेगमेंट यूरोप के 16 प्रतिशत की तुलना में 50 प्रतिशत दक्षिण एशियाई लोगों में मौजूद है। अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वैज्ञानिकों की टीम ने उसी आंकड़ों के आधार पर अध्य्यन किया तो जो परिणाम सामने आया है उसमें इससे अलग जानकारी मिली है। वह यह है कि दक्षिण एशिया में मिलने वाला जीन एसीईटू कोरोना संक्रमण कम करने में अधिक प्रभावी है।
प्रोफेसर चौबे ने बताया कि यूरोप के जीन से वहां के प्रति 10 लाख लोगों में 2000 से ज्यादा लोगों की मौत हो रही है। वहीं दक्षिण एशियाई लोगों में मिलने वाला जीन एसीटूई कोरोना संक्रमण कम करने में ज्यादा सहायक है और इसी वजह से यहां प्रति 10 लाख लोगों में केवल 78 लोगों के मौत होने की ही जानकारी मिली है।
जर्मनी में मिलने वाले आदिमानव के पुतले के साथ बीएचयू के प्रो.ज्ञानेश्वर चौबे
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बीएचयू के प्रो.ज्ञानेश्वर चौबे के अनुसार जो निष्कर्ष सामने आया है वह यह है कि यूरोपीय लोगों में कोविड संक्रमण के लिए जिम्मेदार अनुवांशिक कारण दक्षिण एशियाई लोगों में कोई भूमिका नहीं निभा रहे हैं। सीसीएमबी हैदराबाद के निदेशक डॉक्टर कुमार सामी थंगराज के मुताबिक इस अध्ययन में महामारी के दौरान तीन अलग-अलग समय पर दक्षिण एशियाई देशों में डाटा के साथ संक्रमण और संक्रमण और मृत्यु दर की तुलना भी की गई।
बीएचयू विज्ञान संस्थान से प्रो.ज्ञानेश्वर चौबे,आइएमएस बीएचयू से प्रो.रोयाना सिंह,न्यूरोलॉजी डिपार्टमेंट से डॉक्टर अभिषेक पाठक, अंशिका श्रीवास्तव, नरगिस खानम, ढाका विश्वविद्यालय बांग्लादेश से डाक्टर गाजी सुल्ताना, फॉरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला सागर से डाक्टर पंकज श्रीवास्तव, बिड़ला इंस्टीट्यूट आफ साइंटिफिक रिसर्च जयपुर से डाक्टर प्रशांत सुरवझाला आदि शामिल रहे।