जिले के निजी स्कूलों में बिना किसी खर्च के पढ़ाई करने के लिए चयन होने के बाद भी 6982 बच्चे पढ़ने के लिए तैयार नहीं है। सभी प्रक्रिया पूरी होने के बाद इन्हें केवल बेसिक शिक्षा विभाग से जारी आवंटन पत्र को लेकर संबंधित स्कूल में जाकर प्रवेश सुनिश्चित कराना था, लेकिन अभिभावक यहां नहीं पहुंचे। बच्चों को स्कूल न भेजने का कारण कोरोना महामारी ही माना जा रहा है।
शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीई) के तहत पिछले वर्ष सभी चरणों में कुल मिलाकर 13758 अभ्यर्थियों का चयन हुआ था। जबकि प्रवेश प्रक्रिया 9180 अभ्यर्थियों ने ही पूरी की। वहीं, इस साल दो चरणों के बाद 8709 अभ्यर्थियों का चयन किया गया था। इसमें केवल 6300 ने ही निजी विद्यालयों में प्रवेश की प्रक्रिया पूरी की।
क्या है आरटीई
इस अधिनियम के तहत निजी स्कूलों की 25 फीसदी सीटों पर कक्षा एक या पूर्व प्राथमिक कक्षाओं में आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों का प्रवेश लेना होता है। इन बच्चों की पढ़ाई का खर्च शासन की ओर से स्कूलों के खातों में भेजा जाता है। यह नियम सभी निजी स्कूलों को लागू करना होता है।
अभिभावकों के खाते में जाते हैं पांच हजार रुपये
कॉपी किताब के लिए पांच-पांच हजार रुपये अभिभावकों के खाते में भेजे जाते हैं। आरटीई के तहत प्रवेश के लिए तीन चरणों में ऑनलाइन आवेदन पत्र मंगाए जाते हैं। दस्तावेजों के सत्यापन के बाद लॉटरी के माध्यम से अर्ह विद्यार्थियों को उनके वार्ड में मौजूद निजी स्कूलों का आवंटन होता है।
वर्जन
कोरोना महामारी की वजह से पिछले दो वर्ष में चयनित अभ्यर्थियों की अपेक्षा प्रवेश लेने वाले बच्चों की संख्या घटी है। जिन अभिभावकों ने प्रवेश नहीं लिया है, वो अगली बार के आरटीई प्रक्रिया में आवेदन कर सकते हैं। - विमल केशरी, जिला समन्वयक, आरटीई