विधानसभा चुनाव के लिए मतदान से पहले सपा-कांग्रेस गठबंधन की ओर से जहां अगले मुख्यमंत्री पद के लिए अखिलेश यादव के नाम पर कोई शक नहीं था, वहीं इस पद के लिए बसपा में मायावती का नाम सर्व विदित है। भाजपा ने मुख्यमंत्री पद के लिए कोई नाम घोषित नहीं किया था।
भाजपा ने पूरा चुनाव पीएम नरेंद्र मोदी के नाम पर लड़ा है। यही वजह है कि एग्जिट पोल सामने आने के बाद कयासों का दौर शुरू हो गया है। जानकारों को पूर्वांचल से मुख्यमंत्री बनने की अटकलों में दम लगता है। उनका मानना है कि यदि ओबीसी कैटेगरी से मुख्यमंत्री पद के लिए चुनाव होता है तो पूरव की संभावना और बढ़ जाएगी।
28 अक्तूबर, 2000 से 8 मार्च, 2002 तक पूर्वांचल से जुड़े गृह मंत्री राजनाथ सिंह आखिरी बार मुख्यमंत्री बने थे। इससे पहले पूर्वांचल को यह मौका 24 सितंबर, 1985 से 24 जून, 1988 तक मिला था, जब वीर बहादुर सिंह ने मुख्यमंत्री पद संभाला था।
15 साल बाद पूर्वांचल के लोगों की उम्मीद की वजह है। भाजपा के बड़े नेताओं का मानना है कि 2007 में बसपा को खुले दिल से समर्थन देने वाले पूर्वांचल ने ही 2012 में सपा को एकतरफा जीत दिला दी।
इस बार के चुनाव में भाजपा ने आक्रामक प्रचार और सधी हुई रणनीति के सहारे सपा और बसपा के चिह्नित वोट बैंक को और मजबूत करने वाले वोटों में सेंधमारी कर दी है।
अगड़ों-पिछड़ों पर समान दांव
भाजपा ने पूर्वांचल को फतह करने के लिए प्रचार अभियान में सहारनपुर से सोनभद्र तक भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य और केंद्रीय मंत्री उमा भारती को आगे कर पिछड़ों को साधने की कोशिश की।
अगड़ों को अपने पक्ष में करने के लिए पूर्वांचल के केंद्रीय मंत्रियों राजनाथ सिंह और कलराज मिश्र को पूरे प्रदेश में समान भाव से स्टार प्रचारक बनाया गया। पश्चिम में राजनाथ और कलराज का खासा प्रभाव नहीं माना जाता है।
उमा भारती भी वहां बहुत लोकप्रिय नहीं हैं। हालांकि उमा भारती तो पूर्वांचल से ताल्लुक नहीं रखती हैं पर फूलपुर से सांसद मौर्य को उत्तर प्रदेश की भौगौलिक स्थितियों के हिसाब से पूर्वांचल का ही माना जाता है।