जहां बच्ची को रखा गया था, वहां भी कैमरा नहीं लगा है। इधर, बच्ची की तस्वीर अमर उजाला में छपने के बाद रविवार को कई लोग अस्पताल पहुंचे और बच्ची को गोद लेने की इच्छा जताई। चीफ प्रॉक्टर प्रो. शिवप्रकाश सिंह ने बताया कि कानूनी प्रावधान के हिसाब से ही बच्ची को गोद लिया जा सकता है। बच्ची को बचाने वाली शहनाज को सम्मानित किया जाएगा। चीफ प्रॉक्टर प्रो. शिवप्रकाश सिंह ने बताया कि शहनाज ने जो काम किया है, वह सराहनीय है। उन्हें जल्द ही सम्मानित किया जाएगा।
सर सुंदरलाल अस्पताल , बीएचयू
- फोटो : फाइल
लंका थानाध्यक्ष अश्वनी पांडेय ने बताया कि 12 वर्ष से कम आयु के शिशु का परित्याग करते हुए उसे किसी स्थान पर छोड़ देना भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) में दंडनीय अपराध माना गया है। बीएचयू अस्पताल के मेडिकल ऑफिसर की तहरीर के आधार पर अज्ञात के खिलाफ मुकदमा दर्ज करके जांच की जा रही है। आईपीसी की जिस धारा में मुकदमा दर्ज हुआ है, उसमें माता-पिता या फिर किसी अन्य को सात वर्ष की सजा मिलने का प्रावधान है। अब पुलिस बच्ची को लावारिस हाल में छोड़कर जाने वालों का पता लगा रही है। सीसी फुटेज खंगाले जा रहे हैं। पुलिस की इस कार्रवाई से समाज में एक अच्छा संदेश जाएगा और इस तरह के अमानवीय कृत्य करने वाले एक बार गंभीरता से जरूर सोचेंगे।
वर्ष 2010 में शीतला घाट के पास बम विस्फोट हुआ था। तब 15 माह की बच्ची गौरी लावारिस हाल में मिली थी। पुलिस को शक था कि बच्ची को छोड़ने वालों ने ही विस्फोट किया था। बाद में गौरी की मां गीता और पिता नीलेश पांडेय उर्फ टुनटुन पकड़े गए। जांच से पता चला कि तीसरी बच्ची पैदा होने के बाद नीलेश उसे घाट पर फेंक गया था। पुलिस ने आईपीसी की धारा 317 और बाल संरक्षण अधिनियम की धारा 23 के तहत मुकदमा दर्ज करके दोनों को जेल भेजा था।