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मिसाल: एक हाथ लेकर पैदा हुई तो स्कूल में साथियों ने उड़ाया मजाक, अब सिंधियों की जड़ों पर शोध कर रहीं चंचल

Tue, 07 Jul 2026 12:04 PM IST
Pragati Chand अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।

सार

Varanasi News: एक हाथ लेकर पैदा हुईं चंचल देवनानी का स्कूल में साथियों द्वारा मजाक उड़ाया गया। वहीं बीएचयू में शोध करते हुए उन्होंने सिंधियों के डीएनए में सिंधु घाटी का 66% अंश खोजा। इस दौरान पता चला है कि सिंधी लोगों का इतिहास 5000 साल प्राचीन है। 
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चंचल देवनानी - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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एक ही हाथ लेकर पैदा हुई थी। स्कूल जाने लगी तो दूसरे बच्चे रोज उसका मजाक उड़ाते। लगा कि उसका आत्मविश्वास और धैर्य जवाब दे जाएगा। एक हाथ न होना सामाजिक संघर्ष का रूप लेता जा रहा था। एक बार तो डर के मारे उसके पिता उसे रायपुर से करीब 120 किमी दूर बिलासपुर बीएससी करने जाने नहीं दे रहे थे। लेकिन, आज वहीं बिटिया बीएचयू में पीएचडी कर रही है। सिंधियों को जैविक तौर पर 5000 साल प्राचीन सिंधु घाटी सभ्यता से जोड़कर उसने एक नई पहचान दे दी है। उसने स्कूल-कॉलेज के साथ ही अपने धैर्य की भी परीक्षा पास कर ली।

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बीएचयू के जंतु विज्ञान विभाग में जीन वैज्ञानिक प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे के मार्गदर्शन में पीएचडी कर रहीं चंचल देवनानी की मां मनीषा देवनानी ने भावनात्मक होकर ये बातें अमर उजाला से साझा कीं। मनीषा देवनानी ने कहा कि बेटी हमेशा से प्रोफेसर बनना चाहती थी। उसने इसे ही अपना लक्ष्य बनाया और मेहनत की।

यही वजह है कि न तो कभी उसका आत्मविश्वास कम हुआ और न ही उसने कभी हार मानी। अब तो वह सामान्य लोगों की तरह रहती है, जबकि हम लोगों ने कई बार उस पर आर्टिफिशियल हाथ लगवाने का दबाव डाला। लेकिन, चंचल ने इसे अस्वीकार कर वास्तविक स्थिति में रहने की बात कही। बीएचयू में भी पीएचडी करने आई तो जल्दी कोई प्रोफेसर उसे अपने अंडर में पीएचडी नहीं कराना चाह रहे थे क्योंकि उन्हें भी यह आशंका थी कि क्या वह कर पाएगी।
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चंचल देवनानी - फोटो : अमर उजाला
यहूदियों की तरह से ही सिंधी भी फैले हैं
प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे ने कहा कि सिंधी समुदाय यहूदियों की तरह एक डायस्पोरा है। बंटवारे ने उन्हें कई देशों में बांट दिया, लेकिन उनका डीएनए आज भी 5000 साल पुरानी सिंधु घाटी से जुड़ा हुआ है। वैज्ञानिक भाषा में सिंधी डायस्पोरा कहते हैं यानी कि एक ऐसा समुदाय जो अपनी मूल भूमि से बिखरकर दुनिया भर में फैल गया। फिर भी अपनी आनुवंशिक पहचान को बचाए रखा है।

शोध करती चंचल देवनानी - फोटो : अमर उजाला
सिंधी भी पहन रहे सिंधु घाटी के ब्लॉक प्रिंट वाला सूती कपड़ा
सिंधु घाटी सभ्यता के काल में सिंध क्षेत्र में एक जातीय समूह विकसित हुआ, जिसे आज भी सिंधी के नाम से जाना जाता है। डीएनए के साथ ही पारंपरिक वस्त्र कला अजरख भी इन्हें सिंधु नदी की उस प्राचीन सभ्यता से जोड़ता है। अजरख एक विशेष प्रकार का पारंपरिक ब्लॉक-प्रिंट वाला सूती कपड़ा है। यह सिंधी पहचान, सम्मान और आतिथ्य का प्रतीक है। हड़प्पा और मोहनजो-दड़ो की खोदाई में मिली पुरोहित राजा की मूर्ति के कंधे पर लिपटी शॉल पर वही त्रिफोली पैटर्न दिखता है, जो आज के अजरख में देखने को मिलता है। यानी न सिर्फ डीएनए, बल्कि पहनावा भी 5000 साल पुरानी विरासत को आज तक संजोए हुए है। चंचल ने कहा कि इस अध्ययन ने साबित कर दिया कि भारत और पाकिस्तान में बसे सिंधी समुदाय अपने जीनोम में भी एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। आज के सिंधी चाहे वे विश्व के किसी भी कोने में रहते हों उसी प्राचीन डीएनए को अपने अंदर लिए घूम रहे हैं।
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7.30 लाख डीएनए मार्कर्स और 113 सिंधी व्यक्तियों के डीएनए की हुई जांच
शोध की प्रथम लेखिका चंचल देवनानी और प्रो. चौबे ने गुजरात विश्वविद्यालय की डॉ. खुशबू गौतम और प्रो. राकेश रावल के साथ मिलकर 7.30 लाख डीएनए मार्कर्स और 113 सिंधी व्यक्तियों के डीएनए की गहराई से जांच की। इसकी तुलना दो हजार लोगों से की। आधुनिक सिंधियों के डीएनए को प्राचीन नमूनों से मिलाया तो पाया कि उनके डीएनए का 60 से 66 प्रतिशत हिस्सा प्राचीन सिंधु घाटी क्षेत्र के लोगों से आता है। यह मिश्रण लगभग 2500 से 2900 वर्ष पहले हुआ था। यानी आज से करीब ढाई हजार साल पहले भी सिंधु क्षेत्र के लोग अपनी अलग पहचान बना चुके थे। तब पता चला कि भारत और पाकिस्तान में बसे सिंधी समुदाय न केवल सांस्कृतिक और भाषाई रूप से, बल्कि अपने जीनोम में भी एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। उनकी साझा विरासत प्राचीन सिंधु घाटी सभ्यता तक जाती है। यह शोध आज विज्ञान की अंतरराष्ट्रीय पत्रिका ह्यूमन जेनेटिक्स में प्रकाशित हुआ है।
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