सिंधी भी पहन रहे सिंधु घाटी के ब्लॉक प्रिंट वाला सूती कपड़ा
सिंधु घाटी सभ्यता के काल में सिंध क्षेत्र में एक जातीय समूह विकसित हुआ, जिसे आज भी सिंधी के नाम से जाना जाता है। डीएनए के साथ ही पारंपरिक वस्त्र कला अजरख भी इन्हें सिंधु नदी की उस प्राचीन सभ्यता से जोड़ता है। अजरख एक विशेष प्रकार का पारंपरिक ब्लॉक-प्रिंट वाला सूती कपड़ा है। यह सिंधी पहचान, सम्मान और आतिथ्य का प्रतीक है। हड़प्पा और मोहनजो-दड़ो की खोदाई में मिली पुरोहित राजा की मूर्ति के कंधे पर लिपटी शॉल पर वही त्रिफोली पैटर्न दिखता है, जो आज के अजरख में देखने को मिलता है। यानी न सिर्फ डीएनए, बल्कि पहनावा भी 5000 साल पुरानी विरासत को आज तक संजोए हुए है। चंचल ने कहा कि इस अध्ययन ने साबित कर दिया कि भारत और पाकिस्तान में बसे सिंधी समुदाय अपने जीनोम में भी एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। आज के सिंधी चाहे वे विश्व के किसी भी कोने में रहते हों उसी प्राचीन डीएनए को अपने अंदर लिए घूम रहे हैं।
7.30 लाख डीएनए मार्कर्स और 113 सिंधी व्यक्तियों के डीएनए की हुई जांच
शोध की प्रथम लेखिका चंचल देवनानी और प्रो. चौबे ने गुजरात विश्वविद्यालय की डॉ. खुशबू गौतम और प्रो. राकेश रावल के साथ मिलकर 7.30 लाख डीएनए मार्कर्स और 113 सिंधी व्यक्तियों के डीएनए की गहराई से जांच की। इसकी तुलना दो हजार लोगों से की। आधुनिक सिंधियों के डीएनए को प्राचीन नमूनों से मिलाया तो पाया कि उनके डीएनए का 60 से 66 प्रतिशत हिस्सा प्राचीन सिंधु घाटी क्षेत्र के लोगों से आता है। यह मिश्रण लगभग 2500 से 2900 वर्ष पहले हुआ था। यानी आज से करीब ढाई हजार साल पहले भी सिंधु क्षेत्र के लोग अपनी अलग पहचान बना चुके थे। तब पता चला कि भारत और पाकिस्तान में बसे सिंधी समुदाय न केवल सांस्कृतिक और भाषाई रूप से, बल्कि अपने जीनोम में भी एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। उनकी साझा विरासत प्राचीन सिंधु घाटी सभ्यता तक जाती है। यह शोध आज विज्ञान की अंतरराष्ट्रीय पत्रिका ह्यूमन जेनेटिक्स में प्रकाशित हुआ है।