बीएचयू के ज्योतिषाचार्य पं. गणेश प्रसाद मिश्र का कहना है कि बीएचयू के निर्माण के दौरान ही महामना ने भव्य विश्वनाथ मंदिर के निर्माण के बारे में सोचा था। वह मंदिर की आधारशिला किसी तपस्वी से रखवाना चाहते थे। उन्हें जीके स्वामी कृष्णम नामक तपस्वी की जानकारी मिली।
स्वामी कृष्णम उस वक्त गंगोत्री ग्लेशियर से 150 कोस दूर कांड गुफा में तप कर रहे थे। मालवीय जी ने 1927 में गोस्वामी गणेशदास के हाथों विश्वविद्यालय परिसर में विश्वनाथ मंदिर के शिलान्यास के लिए न्योता भेजा।
तपस्वी कृष्णम को मनाने में गणेशदास को चार साल लग गए। 11 मार्च 1931 को स्वामी कृष्णम के हाथों मंदिर का शिलान्यास हुआ। इसके बाद मंदिर का निर्माण कार्य शुरू हुआ। दुर्भाग्य से मंदिर का निर्माण मालवीय जी के जीवन काल में पूरा ना हो सका।
भव्य मंदिर के निर्माण के लिए उद्योगपति जुगल किशोर बिड़ला ने मालवीय जी से वादा किया था और उसको पूरा किया। 1954 तक शिखर को छोड़कर मंदिर का निर्माण कार्य पूरा हो गया।
17 फरवरी 1958 को महाशिवरात्रि के दिन मंदिर के गर्भगृह में नर्मदेश्वर बाणलिंग की प्राण प्रतिष्ठा के साथ भगवान विश्वनाथ की स्थापना मंदिर में हो गई। मंदिर के शिखर पर सफेद संगमरमर लगाया गया और उनके ऊपर एक स्वर्ण कलश स्थापित है। इस स्वर्णकलश की ऊंचाई 10 फीट है। भारत कला भवन में मंदिर का ब्लू प्रिंट सुरक्षित है।