बीएचयू के गौरवशाली अतीत में दीक्षांत समारोह का भव्य अध्याय भी जुड़ा है। सौ साल से ज्यादा का सफर तय कर चुके इस विश्वविद्यालय के पहले दीक्षांत से लेकर शुक्रवार को होने वाले 103वें दीक्षांत में कई बड़े बदलाव हुए। 1916 में बीएचयू के स्थापना के तीन साल बाद पहला दीक्षांत समारोह 17 जनवरी 1919 में कमच्छा स्थित सेंट्रल हिंदू कॉलेज में हुआ था।
महामना की मौजूदगी में मैसूरू के राजा जो विश्वविद्यालय के चांसलर थे, ने स्नातकों को डिग्री बांटीं। पहले दीक्षांत समारोह में 34 स्नातकों को डिग्री दी गई। पहले दीक्षांत में मास्टर ऑफ साइंस के दो, बैचलर ऑफ साइंस के पांच, मास्टर ऑफ आर्ट्स के एक और बैचलर ऑफ आर्ट्स के 26 के मेधावियों को उपाधियां दी गई थीं। ब्रज कुमारी हक्कू नामक महिला स्नातक को एनी बेसेंट ने उपाधि दी थी। कॉलेज परिसर के प्रार्थना कक्ष और सीढ़ीदार मंच को तंबू से ढककर दीक्षांत समारोह स्थल बना था। तब कुलपति सर पीएस शिवस्वामी अय्यर थे।
उस समय छात्र-छात्राएं बैंगनी गाउन, सुनहरी रेखा वाली हुड और क्रीम रंग के साफा में उपाधियां लेते थे। विश्वविद्यालय के इतिहास ऐसा पहली बार 2013 में आईआईटी बीएचयू के दीक्षांत समारोह के स्नातकों ने गुलामी का गाउन छोड़ पारंपरिक वेशभूषा में उपाधि ग्रहण की। आईटी से आईआईटी बने बीएचयू के भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान ने पारंपरिकता को तरजीह दी। आईआईटी के इस पहले दीक्षांत समारोह में तीन साल के स्नातकों ने धोती-कुर्ता, साड़ी व सलवार सूट में उपाधि ली।
वर्ष 2015 में बीएचयू ने परंपरा को अपनाया
इसके दो साल बाद 2015 में बीएचयू ने इस परंपरा को अपयाया। छात्राओं के लिए लाल बॉर्डर वाली क्रीम कलर की साड़ी और छात्रों के लिए सफेद कुर्ता-पायजामा, पीला साफा और पगड़ी निधारित है। पहले एंफीथियेटर मैदान में भव्य समारोह होता था। अब वातानुकूलित ऑडिटोरियम में दीक्षांत समारोह आयोजित हो रहा है। महामना मालवीय मूल्य अनुशीलन केंद्र के ध्रुव सिंह के मुताबिक पहला दीक्षांत समारोह संपन्न होने के बाद विश्वविद्यालय के मानित अभियंता राय गंगा राम बहादुर ने मैसूरू के महाराजा से मुलाकात करने के लिए महाविद्यालय के लॉन में एक उद्यान-भोज दिया था।
पहले संकायों और विभागों का अलग होता था दीक्षांत
बीएचयू के दीक्षांत समारोह का खास तथ्य एक ये भी है कि पहले हर संकाय, हर विभाग का दीक्षांत समारोह अलग अलग हुआ करता था। स्थापना के कुछ साल तक महामना के संयोजन में जब तक दीक्षांत समारोह हुए, एक साथ स्नातकों को उपाधि वितरित की गईा। जैसे जैसे साल गुजरे, विद्यार्थियों की संख्या बढ़ी, संकाय और विभागों का विस्तार हुआ। सभी संकायों, विभागों का दीक्षांत समारोह अलग अलग होने लगा। ये परंपरा 2004 तक चली। 2005 में जब प्रो. पंजाब सिंह बीएचयू के कुलपति बने, उन्होंने सामूहिक दीक्षांत समारोह की शुरुआत कराई और उसके मुख्य अतिथि राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम रहे।